जानिए कौन हैं आशुतोष मुखर्जी
  • आशुतोष मुखोपाध्याय (मुखर्जी) बंगाल के ख्यातिलब्ध बैरिस्टर और शिक्षाविद् थे
  • सन् 1904 में वे कलकत्ता उच्च न्यायालय में न्यायाधीश नियुक्त हुए. देश के विधिविशारदों में उनका प्रमुख स्थान था

कोलकाता. बंगाल के बाघ के उपनाम से मशहूर शिक्षाविद् आशुतोष मुखर्जी की आज जयंती है. आशुतोष मुखर्जी की जंयती पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने उन्हें याद किया है.

उन्होंने ट्विटर पर लिखा, ‘मैं जयंती के मौके पर बंगाल के बाघ के रूप में विख्यात महान शिक्षाविद् आशुतोष मुखर्जी को प्रेमपूर्वक याद कर श्रद्धांजलि दे रही हूं। वे एक बहुत अच्छे बैरिस्टर थे.”

जानिए कौन हैं आशुतोष मुखर्जी

आशुतोष मुखोपाध्याय (मुखर्जी) बंगाल के ख्यातिलब्ध बैरिस्टर और शिक्षाविद् थे. वे सन् 1906 से 1914 तक कलकत्ता विश्वविद्यालय के उपकुलपति रहे. उन्होंने बांग्ला और भारतीय भाषाओं को एमए की उच्चतम डिग्री के लिए अध्ययन का विषय बनाया.

भारतीय जनसंघ के संस्थापक श्यामाप्रसाद मुखर्जी इनके पुत्र थे. इनका जन्म 29 जून सन् 1864 ई. को कलकत्ता में हुआ था. शिक्षा दीक्षा कलकत्ता में ही हुई. विश्वविद्यालय की शिक्षा पूर्ण होने पर इनकी इच्छा गणित में अनुसंधान करने की थी किंतु अनुकूलता न होने के कारण कानून की ओर आकृष्ट हुए. तीस वर्ष की अवस्था के पूर्व ही आपने विधि में डाक्टरेट की उपाधि प्राप्त कर ली.

सन् 1904 में वे कलकत्ता उच्च न्यायालय में न्यायाधीश नियुक्त हुए. देश के विधिविशारदों में उनका प्रमुख स्थान था. सन् 1920 ई. में कलकत्ता उच्च न्यायालय के प्रधान के पद पर भी कुछ समय तक कार्य किया. दो जनवरी,1924 को इस पद से अवकाश ग्रहण किया.

विश्वविद्यालय शिक्षा के मानदंड को स्थिर करने और तत्संबंधी आदर्शों की स्थापना के लिए आशुतोष का नाम राष्ट्र के इतिहास में अमर रहेगा. कलकत्ता विश्वविद्यालय को परीक्षा लेने वाली संस्था से उन्नत कर शिक्षा प्रदान करने वाली संस्था बनाने का मुख्य श्रेय इन्हीं को है.

सन् 1906 से 14 तक और 1921 से 1923 तक वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के वाइसचांसलर रहे. विश्वविद्यालय के “फेलो” तो वे सन् 1889 से सन् 1924 तक बने रहे.

बांग्ला भाषा को विश्वविद्यालयीय स्तर प्रदान कराने का श्रेय भी प्राप्त है. रवींद्रनाथ ने इनके विषय में कहा था कि “शिक्षा के क्षेत्र में देश को स्वतंत्र बनाने में आशुतोष ने वीरता के साथ कठिनाइयों से संघर्ष किया.” राष्ट्रीय शिक्षा की रूपरेखा स्थिर कर उसे आदर्श रूप में कार्यान्वित करने के लिए इन्हें हमेशा याद किया जाता रहेगा. 25 मई,1924 को इनका निधन हुआ.

हिन्दुस्थान समाचार/ओमप्रकाश

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