भारत में घटा कुपोषण, लेकिन मोटे लोगों की आबादी तेजी से बढ़ी

नई दिल्ली.पिछले तीन सालों में दुनिया में भुखमरी और कुपोषण की समस्या तेजी से बढ़ी है. संयुक्त राष्ट्र फूड एंड एग्रीकल्टर ऑर्गनाइजेशन ने सोमवार को एक रिपोर्ट जारी की है.

हर रात भूखे सोने के लिए मजबूर लोग-

इस रिपोर्ट के मुताबिक 2018 में 82.10 करोड़ लोग हर रात भूखे सोने के लिए मजबूर हुए है.जबकि 2017 में इनकी संख्या 81.10 करोड़ रही थी.मौजूदा समय में दुनिया के 14.9 करोड़ बच्चे भूखे की समस्या से जूझ रहे हैं.

मोटापे की समस्या तेजी से बढ़ रही-

भले ही दुनियाभर में ये समस्या तेजी से बढ़ रही है.लेकिन बीते तीन साल में भारत में कुपोषण के शिकार लोगों की संख्या में काफी कमी आई है. भारत में ये आंकड़ा 2.8 फीसदी तक घटा है.इतना ही नहीं लगातार इस समस्या में कमी आ रही है.जिसे एक अच्छी खबर माना जा रहा है.

भूख के संकट का असर कम-

भारत के लिए ये अच्छी खबर है लेकिन इसी के साथ भारत के लिए एक बुरी खबर भी है.दरअसल देश में तेजी से लोग मोटापे का शिकार हो रहे है. रिपोर्ट के अनुसार अब देश में भूख के संकट का असर कम हो रहा है.लेकिन मोटापा सेहत के लिए नए मुद्द के रूप में उभर रहा है.

यूएनएफएओ के हाल ही में जारी हुई रिपोर्ट के अनुसार 2012 में 2 करोड़ 40 लाख थी.जो कि 2016 तक बढ़कर 3 करोड़ 28 लाख हो गई है.रिपोर्ट के मुताबिक मोटापे का शिकार सबसे ज्यादा बच्चे हो रहे है. बच्चों में मोटापा महामारी की तरह उभर रहा है.

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो ने कही ये बात-

आपको बता दें कि संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुतरेस ने कहा है कि विश्व में विभिन्न सरकारों के लगातार प्रयासों के बावजूद आज भी 47 गरीब देशों में गरीबी, भुखमरी, कुपोषण, लिंग असमानता के कारण महिलाओं के प्रति दुर्व्यवहार हो रहा है.यही नहीं यहां मूलभूत स्वास्थ्य सेवाओं में खास सुधार नहीं हुआ है. उन्होंने अफसोस जताया कि विश्व में आज भी आधी जनसंख्या यानी साढ़े तीन अरब लोग मूलभूत स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित हैं.

संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्य देश-

इन अत्यधिक 47 निर्धन देशों में दक्षिण एशिया से अफगानिस्तान, बांग्लादेश और भूटान सहित ज़्यादातर देश अफ्रीका में हैं. संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्य देश हैं. विश्व में आज भी 84 करोड़ लोग कुपोषण के शिकार हैं. 

संयुक्त राष्ट्र महासचिव ने मंगलवार को दुनिया भर में विभिन्न सरकारों की ओर से किए जा रहे सतत विकास के माध्यम से हो रहे प्रयासों की सराहना की. उन्होंने इस बात पर निराशा भी जताई कि अत्यधिक गरीबी, भुखमरी और स्वास्थ्य सेवाओं में अपेक्षित सुधार नहीं हो सका है.

उन्होंने इस संदर्भ में एक विस्तृत रिपोर्ट जारी की. इस रिपोर्ट में सतत विकास के लिए 17 संकेतकों के आधार पर कहा गया है कि विश्व में अफ़्रीका, एशिया और लेटिन अमेरिका में 40 से 85 प्रतिशत लोग अत्यधिक गरीबी से जूझ रहे हैं.

2030 तक निर्धारित लक्ष्यों को हासिल

यहां वर्ष 2030 तक निर्धारित लक्ष्यों को हासिल कर पाना एक दुष्कर चुनौती है. उन्होंने कहा कि यूरोप में मात्र दस प्रतिशत लोग अत्यधिक ग़रीबी रेखा से नीचे आते हैं.

उन्होंने कहा कि पिछले तीन दशक में स्थिति में भारी सुधार हुआ है. सन 2015 में दस प्रतिशत लोग अत्यधिक ग़रीबी की श्रेणी में आते थे, जो अब छह प्रतिशत हैं.

रिपोर्ट में कहा गया है कि लिंग असमानता और 15 से 49 वर्ष की आयु की महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार, हिंसा आदि की घटनाओं में कमी तो आई है लेकिन आज भी पांच में से एक महिला हिंसा की शिकार हो रही है.

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