जरूरी जांच, जो हुई ही नहीं
  • 11 मई, 1953 को कठुआ में गिरफ्तारी के बाद कश्मीर की शेख अब्दुल्ला सरकार ने उन्हें बिना किसी मुकदमे के ही हिरासत में ले लिया था
  • श्यामा प्रसाद मुखर्जी के निधन के बाद 30 जून, 1953 को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उनकी मां जोगमाया देवी को एक पत्र लिखकर संवेदना जताई थी

रघुवेंद्र सिंह

श्यामा प्रसाद मुखर्जी का निधन 23 जून, 1953 को हुआ था. अविभाजित बंगाल में मंत्री रह चुके और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के मंत्रिमंडल में शामिल रहे, मुखर्जी विपक्ष के एक प्रमुख नेता और भारतीय जनसंघ के संस्थापक थे. 

11 मई, 1953 को कठुआ में गिरफ्तारी के बाद कश्मीर की शेख अब्दुल्ला सरकार ने उन्हें बिना किसी मुकदमे के ही हिरासत में ले लिया था. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के निधन के बाद 30 जून, 1953 को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उनकी मां जोगमाया देवी को एक पत्र लिखकर संवेदना जताई थी. 

जिसके जवाब में 4 जुलाई को जोगमाया देवी ने लिखा, ‘मेरे बेटे को बिना किसी ट्रायल के हिरासत में लिया गया और हिरासत में ही उसका निधन हो गया. आप कहते हैं, आपने मेरे बेटे की हिरासत के दौरान कश्मीर का दौरा किया था. 

आप मेरे बेटे के के प्रति स्नेह रखने की भी बात करते हैं. लेकिन मुझे इस बात पर आश्चर्य होता है कि वहां उससे व्यक्तिगत रूप से मिलने और उसके स्वास्थ्य और अन्य व्यवस्थाओं के बारे में खुद को संतुष्ट करने से आपको किसने रोका था? …

उसको हिरासत में लिये जाने के बाद मैंने, उसकी मां ने, जम्मू कश्मीर सरकार से जो पहली सूचना प्राप्त की, वो ये थी कि मेरा बेटा अब नहीं रहा. … और किस क्रूर व रहस्यमय तरीके से संदेश दिया गया था.’

पंडित नेहरू और जोगमाया देवी के बीच का आगे का संवाद उदासी को और बढ़ाने वाला है.इसके कुछ महीने बाद 27 नवंबर, 1953 को, पश्चिम बंगाल विधानसभा में कश्मीर में हिरासत के दौरान श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मृत्यु की परिस्थितियों की जांच के लिए एक प्रस्ताव लाया गया था. 

इस प्रस्ताव में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश की अध्यक्षता वाले एक आयोग के माध्यम से जांच कराने की बात कही गई थी. हैरानी की बात है कि कांग्रेस पार्टी के एक विधायक शंकर प्रसाद मित्रा ने इस प्रस्ताव में संशोधन करने का प्रस्ताव प्रस्तुत किया. 

पूरा लेख पढ़ें यथावत के 1-15 जुलाई के अंक में…

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