Military voters in Uttarakhand
Military voters in Uttarakhand

हिंदीभाषी प्रदेशों में जातीय समीकरण जितना हावी होता है वहीं देवभूमि यानी पहाड़ी राज्य उत्तराखंड में हार-जीत का फैसला सैनिक वोटर्स करता है. राज्य में मौजूदा समय में 1 लाख 69 हजार 519 वोटर्स सेना से रिटायर हो चुके हैं. जबकि 88 हजार 600 वोटर्स अभी भी देश की सरहदों की रक्षा कर रहे हैं. यानी की इस प्रदेश में 2 लाख 58 हजार 119 वोटर्स सैनिक हैं.

ऐसे में हर दल सैनिक वोटरों को साधने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहता है. हालांकि, सैनिक पृष्ठभूमि से जुड़े वोटरों के रुझान को भांपना किसी भी दल के लिए चुनौती भरा काम है.

प्रदेश में अभी तक हुए चुनावों में पूर्व सैनिक वोटरों पर नजर डालें तो ये मुख्य रूप से केंद्रीय मुद्दों के आधार पर ही वोटिंग करते हैं.

2014 के लोकसभा चुनाव में उत्तराखंड में अंतिम चरण में मतदान हुआ था, लेकिन इस बार पहले ही चरण में यहां मतदान रखा गया है. इस चुनाव में राज्य और केन्द्र दोनों ही जगह बीजेपी की सरकार है. और पार्टी के सामने अपनी साख बचाए रखने की सबसे बड़ी चुनौती भी है. तो वहीं कांग्रेस के सामने यह एक ऐसा अवसर है, जिससे वह अपनी पिछली दो पराजयों का बदला ले सके.

उत्तराखंड की सत्ता दो ही प्रमुख पार्टियों (बीजेपी और कांग्रेस) सत्ता के करीब रहती हैं. राज्य गठन के बाद से अब तक हुए तीन लोकसभा चुनावों में अमूमन इन्हीं दोनों पार्टियों के बीच मुख्य मुकाबला होता आया है. 

2004 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी एक लोकसभा सीट हरिद्वार जीतने में सफल रही, इसे महज एक इत्तेफाक ही कहा जा सकता है. तब बीजेपी को तीन, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी को एक-एक सीट पर जीत मिली. 

2009 के लोकसभा चुनाव में पांचों सीटों पर कांग्रेस ने जीत दर्ज की थी. सैन्य बहुल प्रदेश उत्तराखंड में कुल मतदाताओं में तकरीबन 12 फीसदी मतदाता सैन्य परिवारों से हैं. ये वोटर पांच में से तीन सीटों पर जीत-हार में अहम भूमिका निभाते हैं. 

पौड़ी गढ़वाल संसदीय सीट पर तो राज्य गठन के बाद हुए 4 (एक उपचुनाव भी शामिल) में से 3 चुनावों में सैनिक पृष्ठभूमि से जुड़े उम्मीदवारों ने ही जीत हासिल की है. यही कारण है कि राजनीतिक दल इन्हें लुभाने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ते.

मौजूदा परिस्थितियों में भी केंद्र व प्रदेश में सत्तासीन भाजपा व विपक्ष कांग्रेस सैन्य मसलों पर बेहद सतर्कता से बयान जारी कर रहे हैं. यही वजह है कि पिछले दिनों राहुल गांधी देहरादून पहुंचे तो अपनी रैली में इस मुद्दे का जिक्र करना नहीं भूले.

केंद्र व प्रदेश सरकारों के एजेंडे में सैनिक व पूर्व सैनिकों के हितों से जुड़े मुद्दे प्रमुखता से रखे जाते हैं. प्रदेश में इस समय पूर्व सैनिकों की ज्यादातर संख्या देहरादून, पौड़ी, अल्मोड़ा व पिथौरागढ़ जिलों में निवास करती हैं. उत्तराखंड में सैनिक वोटर विशेष रूप से पौड़ी, टिहरी व अल्मोड़ा लोकसभा सीटों पर निर्णायक भूमिका में हैं.

अल्मोड़ा में 80 हजार से अधिक पूर्व सैनिक, वीर नारियां और सर्विस वोटर हैं. यहां भी सैन्य पृष्ठभूमि से जुड़े वोटरों की संख्या तीन लाख से अधिक है.

वहीं टिहरी लोकसभा सीट की बात करें तो यहां तकरीबन 50 हजार पूर्व सैनिक, वीर नारियां और सर्विस वोटर हैं. इस तरह यहां सैन्य परिवारों के वोटों की संख्या दो लाख के आसपास है. ये वोटर निर्णायक भूमिका में रहते हैं.

उत्तराखंड राज्य के चुनावी परिदृश्य पर यदि नजर डालें तो राज्य में युवा, सैनिक और पूर्व सैनिक मतदाताओं को गेम चेंजर माना जा सकता है. उत्तराखंड की पांचों लोकसभा सीटों पर सैनिक और पूर्व सैनिकों की करीब संख्या ढाई लाख से ज्यादा है. यह कुल वोटरों का 3.35 फीसदी हैं. अगर इनके परिवार को शामिल कर दिया जाए तो यह मत फीसद बढ़कर 12 फीसदी पहुंच जाता है.

रिटायर्ड सैनिक वोटर्स (जिले वार)

अल्मोड़ा – 13 हजार 979

बागेश्वर – 11 हजार 440

चंपावत – 4 हजार 669

पिथौरागढ़ – 24 हजार 690

नैनीताल – 14 हजार 075

ऊधमसिंह नगर – 9 हजार 238

चमोली – 14 हजार 745

देहरादून – 28 हजार 689

पौड़ी – 30 हजार 104

हरिद्वार – 5 हजार 366

रुद्रप्रयाग – 4 हजार 899

टिहरी – 6 हजार 592

उत्तरकाशी – 1 हजार 33

अब देखना दिलचस्प होगा कि इस बार यहां किस सीट पर किसका कब्जा होगा.

हिन्दुस्थान समाचार/राजेश