शास्त्रीय संगीत सुनने वालों की संख्या पहले से बढ़ी – मधुप मुद्गल
  • पिता के अलावा कुमार गंधर्व से इन्होंने संगीत की शिक्षा ली. गायन की शैली ख्याल में महारथ हासिल की.
  • हमारे यहां आज भी घराना परपंरा को कई लोग फॉलो कर रहे हैं और उसे आगे बढ़ा रहे हैं

ब्रजेश कुमार/ विजय कुमार राय

तानपुरे के तार को अगर ठीक से मिलाना सिखना है तो आज मधुप मुद्गल जैसा दूसरा कोई नहीं है. शास्त्रीय संगीत की महान हस्तियों का सानिध्य तो मधुप मुद्गल को बचपन से ही मिला, लेकिन संगीत की औपचारिक शिक्षा 15 वर्ष की उम्र से शुरू हुई.

पिता के अलावा कुमार गंधर्व से इन्होंने संगीत की शिक्षा ली. गायन की शैली ख्याल में महारथ हासिल की. संगीत का यह इकलौता परिवार है, जिनके तीन सदस्य पद्म पुरस्कार से सम्मानित हैं.

फिलहाल दिल्ली का गंधर्व महाविद्यालय उनके नेतृत्व में आगे बढ़ रहा है. यहां 1100 विद्यार्थी संगीत की शिक्षा ले रहे हैं. उनसे खास बातचीत के अंश

इस बातचीत में उन्होंने बताया कि शास्त्रीय संगीत में घराना का बड़ा महत्व होता है. घराना का संबंध गायकी की खास शैली को लेकर है. मसलन कोई एक शैली विशेष घराने की पहचान रही है. संगीत में जबकि ढेरों प्रयोग हो रहे हैं, उसमें किसी खास शैली से बंधकर रहना कितना सरल या मुश्किल काम होता है.

इस बारे में उन्होंने बताया कि हमारे यहां आज भी घराना परपंरा को कई लोग फॉलो कर रहे हैं और उसे आगे बढ़ा रहे हैं. ऐसे लोग भी हैं जो घराने की शैली को आत्मसात कर कुछ नया करने की कोशिश करते रहे हैं. 

यह तभी संभव है, जब एक में पारंगत हो चुके हों. उसके बाद ही किसी नए चीज की संभावना जगती है. यह प्रक्रिया दशकों से चली आ रही है. 

घराना परंपरा में एक से बढ़कर एक उस्ताद हुए, जिन्होंने विशिष्ट शैली को गढ़ा. वे जीनियस लोग थे. यह स्वाभाविक है कि परंपरा में जो श्रेष्ठ या जीनियस होते हैं, उनका अनुकरण किया जाता है.

चाहे-अनचाहे उनका प्रभाव पड़ता ही है. यह होता रहा है. यहां एक उदाहरण से अपनी बात को स्पष्ट करना चाहता हूं. अगर हम किसी बाग में जाते हैं तो ढेरों फूल होते हैं, उन फूलों को देखकर यह नहीं कहते हैं कि एक सुंदर है, दूसरा नहीं. क्योंकि, फूल तो सारे सुंदर होते हैं. 

सभी स्वयं में विशेष होते हैं. उन सबके मिलने से बाग सुंदर दिखाई देता है. घराना उसी सुंदर बाग की तरह है, जहां एक से एक सुंदर फूल खिलते रहते हैं. सबकी अपनी खासियत होती है.

यहां कोई बंधन या सीमा नहीं है. हां, प्रयोगधर्मिता है. एक खास शैली में लोग प्रयोग करते रहते हैं. मैं समझता हूं यह अच्छी बात है. उसका प्रभाव गायन में झलकता है.

पढ़े पूरी बातचीत नवोत्थान के अप्रैल के अंक में…

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