माननीयों से गलती हो जाती है!

प्रतिभा कुशवाहा

अभी ज्यादा समय नहीं बीता जब लोक कलाकार सपना चौधरी को कांग्रेस उम्मीदवार बनाए जाने की खबर सामने आयी, और इसे लेकर वे सोशल मीडिया पर ट्रोल हो गईं. 

यहां तक, ‘नचनिया’ से शब्दों का इस्तेमाल करके उनका चरित्र हनन कर डाला. जिन लोगों ने उन्हें उनकी कला की दीवानगी के चलते उन्हें आज इस मुकाम पर बैठाया, उन्हीं लोगों को उनके राजनेत्री बनने से ‘समस्या’ थीं.

इसी तरह जब प्रियंका गांधी के औपचारिक रूप से राजनीति में प्रवेश की घोषणा हुई, तब भी जनसाधारण से लेकर जनता के प्रतिनिधि माननीयों के ऐसे ही शर्मनाक बयान सामने आए. 

प्रियंका के रंग-रूप, पहनावे से लेकर कई महिला विरोधी टिप्पणियां गईं. केंद्रीय मंत्री महेश शर्मा ने उन्हें ‘पप्पू की पप्पी’ तक कह डाला. जब भारतीय राजनीति के एक सशक्त परिवार से आने वाली महिला पर ऐसी टिप्पणी हो सकती है, तो जया प्रदा की क्या वकत.

भले ही वे 25 साल से राजनीति की गलियों में सक्रीय हों और भले ही वे जनकार्य कर रही हों. वे आज भी सपा नेता फिरोज खान के लिए ‘शामें रंगीन’ करने के लिए ही राजनीति में आईं हैं.

फिल्मों में काम करने के कारण आजम खान जैसे ‘माननीयों’ को पूरी आजादी है कि वे उन पर कैसी भी टिप्पणी कर सकते हैं. यह ठीक वैसा ही है, जब कांग्रेस के बड़े नेता संजय निरूपम आज की केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी को ‘टीवी पर ठुमके लगाने वाली’ ही मानते और जानते थे.

जिस तरह आजम खान अपनी महिला विरोधी बयानों के लिए कुख्यात हैं, वैसे ही पूर्व जदयू नेता शरद यादव भी जाने जाते हैं. उनका संसद में महिला आरक्षण के संदर्भ में दिया गया ‘परकटी महिलाएं’ वाले बयान की काफी आलोचना हुई थी.

हाल ही में उन्होंने राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के लिए कहा कि उन्हें आराम दो, बहुत मोटी हो गई हैं, पहले पतली थीं.

पूरा लेख पढ़ें युगवार्ता के 28 अप्रैल के अंक में…

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