आत्म परिचय का अवसर

रामबहादुर राय

आत्म-रूपांतरण की वह घटना थी. इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के आत्म-रूपांतरण की. ऐसा आत्मसाक्षात्कार से ही संभव होता है. भारत की विद्या परंपरा में इसे पुनर्जन्म भी मानते हैं.

व्यक्ति, समाज, संस्था और देश भी जब इस प्रक्रिया से गुजरता है तो वह आत्म-रूपांतरित हो जाता है. उसे जो होना चाहिए. उस अवस्था को उपलब्ध हो जाता है.

 इस दृष्टि से इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र कब दोबारा जन्मा? यह प्रश्न अत्यंत स्वाभाविक है. इसी के साथ यह भी कोई पूछ सकता है कि आत्म रूपांतरण से अभिप्राय क्या है?

इन दोनों प्रश्नों का सीधा और एक सरल उत्तर उस घटना में है जो इस वर्ष गुरु पूर्णिमा को पूर्वान्ह केंद्र के परिसर में घटित हुई. समय था- दिन के ग्यारह बजे. तारीख थी- 16 जुलाई.

केंद्र के कलाकोश प्रभाग की स्थापना इसी दिन हुई थी. जिसका उत्सव हर वर्ष केंद्र में बड़े उल्लास, उत्साह और कलात्मक रीति से मनाया जाता रहा है. उस दिन वार्षिकोत्सव का ही अवसर था.

इस वर्ष आत्म-रूपांतरण घटित हुआ तो कैसे? इसे जानने से पहले ये जरूरी है कि यह जानना कि कलाकोश का कार्य क्या है? इस प्रभाग का कार्य कला, मानविकी और सांस्कृति विरासत से जुड़े मूल ग्रंथों और पोथियों के शोध और प्रकाशन का है.

यह कार्य 1987 से केंद्र का कलाकोश प्रभाग कर रहा है. केंद्र की बौद्धिक परिकल्पना का प्रतिनिधित्व करने वाले देवदार, अश्वथ, न्यगरोध, अशोक, अर्जुन और कदंब के पेड़ इसके शुरू से साक्षी हैं.

लंबे जीवन वाले ये वृक्ष पौधे के रूप में केंद्र के शुरू में ही लगाए गए थे. अब ये वृक्ष तो पूर्णता के भाव से भर गए हैं. इनका पूर्णत्व ही केंद्र के आत्म-रूपांतरण की इसलिए घटना बनी, क्योंकि भरतमुनि की प्रतिमा रूप साक्षात उपस्थित हो गए हैं.

उन्हें देखना, जानना और जीना संभव हो गया है. उनकी प्रतिमा दर्शन के लिए उपलब्ध हो गई है. केंद्र को उसका परिचय मिल गया है. क्या केंद्र अपरिचय की यात्रा पर था? इसका उत्तर सरल है. कोई संस्था अपरिचय में कैसे रह सकती है.

पूरा लेख पढ़ें नवोत्थान के अगस्त अंक में…

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