नाट्यशास्त्र और इससे जुड़ा लोक- तत्व

डॉ. मयंक चतुर्वेदी

संस्कृत के आचार्यों और उनके योगदान पर जब भी विमर्श होता है, तो सबसे पहले भरतमुनि का स्मरण आता है. यह स्वाभाविक है.

व्यक्ति की पहचान उसके विचारों और उनपर आधारित कर्म से होती है. इस दृष्टि से भरतमुनि के “नाट्यशास्त्र” की विवेचना समीचीन है, क्योंकि नाट्य परंपरा की गहराई में जाने पर उनका ही सर्वप्रथम रचित ग्रंथ “नाट्यशास्त्र” मिलता है.

इसलिए वे नाटक, फिल्म, प्रहसन इत्यादि कला से संबंधित जितने भी परंपरागत आदर्श संस्कृति-निष्ठ और यत्र-तत्र-सर्वत्र बिखरे प्रकार हैं, उनके वे आदि आचार्य हैं. भरतमुनि कहते हैं, “न तज्ज्ञांन न तच्छिल्पं न सा विद्या न सा कला. नासौ योगो न तत्कर्म नाट्येडस्मिन यन्न दृश्यते..” अर्थात- “न ऐसा कोई ज्ञान है, न शिल्प, न कोई ऐसी विद्या, न कला, न योग और ना ही कोई कर्म, जो नाट्य में न पाया जाता हो.” 

यानी जो भी सांसारिक विधाएं हैं, वे सभी कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में नाटक का ही अंग हैं. सही भी है, नाटक का प्रधान तत्व है- भावना.

दूसरा प्रमुख तत्व विचार है. उन दोनों का उचित समन्वय ही किसी नाटक, फिल्म, प्रहसन या कला को जन्म देता है. भरतमुनि के इस श्लोक और व्याख्या को यदि प्रत्येक मनुष्य के दैनन्दिन जीवन से जोड़कर देखें तो स्थिति बहुत कुछ स्पष्ट हो जाती है.

शायद, इसलिए आगे हुए भारतीय एवं पाश्चात्य नाट्चकारों को परस्पर कहना पड़ा कि व्यक्तित्व की पूर्णता के लिए “थियेटर” का ज्ञान आवश्यक है.

जीवन एक रंगमंच है, जिसमें हम सभी अलग-अलग समय में आते हैं. अपना-अपना किरदार निभाते हैं और फिर चले जाते हैं. फिर एक नई शुरुआत होती है. अनन्त से, आकाश से, शून्य से शिखर की ओर.

वस्तुत: होता भी यही है, हम सभी नित्यप्रति अनेक भूमिकाओं का निर्वहन करते हैं. प्रत्येक रिश्ते में नाटकीयता का पुट कहीं न कहीं रहता है.

पति-पत्नी, पिता-पुत्र, माता-पुत्रि, भाई-बहन या अन्य किसी रिश्ते को लें. यदि इनमें से नाटकीयता को समाप्त कर दिया जाए तो जीवन नीरस हो जाएगा, क्योंकि नाटकीयता वह तत्व है, जो जीवन के नीरस प्रसंगों को भी रोचक बना देता है.

पूरा लेख पढ़ें नवोत्थान के अगस्त अंक से…

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