शुरू होने वाली है रथयात्रा, ऐसे निकलेंगे भगवान जगन्नाथ…

विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ पुरी यात्रा का शुभारंभ आषाढ़ मास की द्वितीया से होता है. सप्तपुरियों में से एक पुरी की इस रथ यात्रा को इस बार चार जुलाई से निकाला जाएगा. इस यात्रा का समापन आषाढ़ शुक्ल दशमी यानी नौ दिनों बाद होता है.

इस यात्रा में भगवान कृष्ण और बलराम अपनी बहन सुभद्रा के साथ रथ पर सवार होकर निकलते हैं. इस यात्रा के दौरान भगवान अपने भक्तों को दर्शन देंगे और इसी के साथ यात्रा श्री गुण्डिचा मंदिर के लिए प्रस्थान करेगी.

ये रथ यात्रा सैंकड़ों सालों से निकाली जा रही है. इसे यात्रा नहीं बल्कि उत्सव की तरह मनाया जाता है. इस उत्सव में लाखों की संख्या में श्रद्घालु शामिल होने के लिए पहुंचते हैं. इस रथयात्रा उत्सव के दौरान भगवान जगन्नाथ को रथ में बिठाकर पूरे नगर में घुमाया जाता है.

पुराणों में भी है महत्व

इस रथयात्रा का महत्व पुराणों में भी देखने को मिलता है. इसके अनुसार भगवान की इस यात्रा में श्रद्धालु कई पारंपरिक यंत्रों को बजाते हुए विशाल रथों को मोटे-मोटे रस्सियों से खींचा जाता है.

ऐसे होती है यात्रा की शुरूआत

इस रथयात्रा की शुरूआत रथ के सामने सोने के हत्थे की झाडू लगाकर किया जाता है. इसके बाद मंत्रोच्चार व जयघोष होता है. फिर विधि विधान के साथ रथयात्रा शुरू की जाती है.

इस यात्रा रस्सी खींचने को लेकर खास मान्यता भी है. एक दूसरे के साथ सहयोग करते हुए रथ की रस्सी खींचने में मदद करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है.

ये रथयात्रा गुण्डिचा मंदिर यानी भगवान की मौसी के घर पहुंचकर संपन्न होती है. ये ही वो मंदिर है जहां विश्वकर्मा ने तीनों देव प्रतिमाओं को बनाया था.

ऐसा भी माना जाता है कि अगर सूर्य अस्त से पहले ही रथ गुण्डिचा मंदिर नहीं पहुंचता तो रथ यात्रा अगले दिन मंदिर पहुंचती है और यात्रा पूरी करती है.

इस मंदिर में यात्रा एक हफ्ते का विश्राम करती है. भगवान यहां सप्ताह भर तक रूकते हैं. यहां उनकी विधि-विधान से पूजा की जाती है और स्वादिष्ट पकवानों का भोग लगाया जाता है.

यहां भगवान बिमार पड़ जाते हैं. इसके बाद उन्हें पथ्य का भोग लगाया जाता है, जिसके बाद उनका स्वास्थ्य ठीक होता है. रथयात्रा के तीसरे दिन लक्ष्मी जी भगवान जगन्नाथ को ढूंढते हुए आती हैं, मगर द्वैतापति दरवाजा बंद कर लेते हैं.

लक्ष्मी जी नाराज होकर रथ का पहिया तोड़ती हैं और अपने मंदिर लौट जाती हैं. इसके बाद भगवान लक्ष्मी जी को मनाने के लिए मंदिर जाते हैं. भगवान कई उपहार लेकर लक्ष्मी जी को मनाते हैं.

जिस दिन वो मान जाती हैं उस दिन को विजया दशमी के रूप में मनाया जाता है. वहीं नौ दिन पूरे होने के बाद भगवान जगन्नाथ, जगन्नाथ मंदिर वापस चले जाते हैं.

यात्रा में कई अनोखे लम्हें

तीनों भगवानों के रथ अलग अलग होते हैं. इनके रंगों और इनके आकार के जरिये ये आसानी से पता चलता है कि कौन से भगवान किस रथ में सवार हैं.

ये हैं तीनों के अलग अलग रंग

इस यात्रा में बलरामजी का रथ लाल और हरे रंग का होता है. वहीं सुभद्रा जी का रथा काले और नीले रंग का होता है. जबकि भगवान जगन्नाथ का रथ लाल और पीले रंग का होता है.

अलग अलग रंग होने के कारण भक्त आसानी से पहचान लेते हैं कि भगवान किस रथ में सवार हैं. ऐसी भी मान्यता है कि रथ यात्रा के दौरान बारिश जरूर होती है.

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