चुनाव अभियान से दूर या पास लालू
  • 40 लोकसभा सीट वाले बिहार में दोनों प्रमुख गठबंधनों में लड़ाई के केन्द्र में नमो और लालू ही हैं
  • यह पहला चुनाव है जिसमें लालू चुनाव अभियान से दूर रहकर बिहार-झारखंड में चुनावी महौल गरमा रहे हैं

अरूण कुमार पाण्डेय

लालू जेल में रहें या जेल से बाहर, बिहार की राजनीति की एक धुरी लालू ही हैं. लोकसभा के इस बार के चुनाव में भी एक ओर नरेन्द्र मोदी तो दूसरी ओर लालू के प्रभाव के बीच ही राजनीतिक मुकाबला है. 

40 लोकसभा सीट वाले बिहार में दोनों प्रमुख गठबंधनों में लड़ाई के केन्द्र में नमो और लालू ही हैं. लालू जेल से बाहर होते, तो चुनावी परिदृश्य कुछ और बनता. 

विधानसभा के पिछले चुनाव में लालू ने अपने धुआंधार प्रचार और आरक्षण मुद्दे को हथियार बनाकर भाजपा को सत्ता में आने से रोकने में कारगर भूमिका निभायी थी. 1990 के बाद यह पहला चुनाव है जिसमें लालू चुनाव अभियान से दूर रहकर बिहार-झारखंड में चुनावी महौल गरमा रहे हैं. लालू ट्वीट कर नमो-नीतीश पर हमला बोल रहे थे. 

जेल से उनके मार्गदर्शन में महागठबंधन में न सिर्फ सीटों का बंटवारा हुआ, बल्कि सहयोगी दलों के उम्मीदवार तय करने में भी उनकी प्रभावकारी भूमिका रही है. 

अब यह लाख टके का सवाल बना है कि क्या बिहार में नमो-नीतीश-रामविलास के मुकाबले छह दलों का लालू का राजनीतिक कुनबा ठहर पायेगा?

जेल से लालू का भावनात्मक पत्र

जमानत याचिका खारिज होने के फौरन बाद लालू ने जेल से ही मेरे प्यारे बिहारवासियों को संबोधित तीन पृष्ठों का भावनात्मक पत्र जारी किया है- ‘इस वक्त जब बिहार एक नयी गाथा लिखने जा रहा है, लोकतंत्र का उत्सव चल रहा है. 

यहां रांची के अस्पताल में अकेले बैठकर सोच रहा हूं. राजद के सिपाहियों और दलित बहुजन साथियों, गठबंधन में कई दल हैं, इसलिए सीट बंटवारे में सबका ध्यान रखना पड़ा. 

हमारे कई नेता और कार्यकर्ता जिन्हें टिकट नहीं मिला उनसे अपील है कि सब कुछ भुलाकर दलित बहुजन समाज का आरक्षण और संविधान बचा लीजिये. 

देश को खेत समझिये और जानिए कि अगर अपना समाज खेत बचा लिया, तो फसल फिर लगेगी. यह आरपार की लड़ाई है. इज्जत और गरिमा सब दांव पर है. 

पढ़ें पूरा लेख युगवार्ता के 21 अप्रैल के अंक में…

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