International Labour Day 2020-श्रमेव जयते, इन मेहनत के पुजारियों की बदौलत है समाज का अस्तित्व

मजदूर दिवस
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नई दिल्ली. श्रमेव जयते जिसका अर्थ है श्रम की जय हो. आज का दिन उन सभी को समर्पित है जिन्होंने अपना खून पसीना बहा कर मेहनत और मजदूरी से इस सभ्यता को स्थापित करने में दान दिया है. मेहनतकश लोगों और मजदूरों के बारे में इस तरह की बहुत सारी बातें कई और लिखी जाती हैं.

श्रम के इसी महत्व को समझते हुए आज का दिन मजदूरों को समर्पित है आज पूरी दुनिया मजदूर दिवस मना रही है. ये दिन श्रम के पुजारियों का है जिनकी बदौलत इस सारे शब्द समाज का पूरा ताना-बाना अस्तित्व में है.

शायद इसी महत्व को समझकर मशहूर शायर साहिर लुधियानवी की यह पंक्तियां बिल्कुल सही लिखी गई है. हम मेहनत वालों ने जब भी मिलकर कदम बढ़ाया सागर नीरसता छोड़ा पर्वत ने शीश झुकाया. वैसे तो मजदूरों की हालत देशभर में खराब ही है लेकिन दयनीय स्थिति कृषि मजदूरों की है.

इन लोगों को असंगठित क्षेत्र का मजदूर होने के कारण इनकी गिनती ना तो मजदूरों में होती है और ना ही किसानों मे गिने जाते हैं. फलस्वरूप ना तो वाले फायदों से ये लोग लाभान्वित होते हैं और ना ही घटना में घायल होने पर ही ने किसी तरह की सहायता मिल पाती है. लेकिन इस सबके बावजूद यह लोग अपना खून पसीना बहा कर देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती देते हैं.

खेतिहर मजदूरों की श्रेणियां

अनौपचारिक मजदूर
इस प्रकार के मजदूर दैनिक मजदूर भी कहलाते हैं यह किसी भी किसान के खेत में दैनिक दिहाड़ी पर काम करते हैं इन्हें दैनिक मजदूरी मिलती है पास नाम मात्र को सामाजिक सुरक्षाहोती है. जिस कारण इनका अस्तित्व हमेशा खतरे में रहता है. भारत में करीब तीन करोड़ घुमंतू मजदूर हैं हालत सबसे कमजोर है कटाई निराई आदि का काम समाप्त होते ही यह लोग बेरोजगार हो जाते हैं.

वार्षिक अनुबंधित मजदूर
इस श्रेणी मे वह मजदूर आते हैं जिनके पास अपनी भूमि नहीं होती और जमीदार के साथ मौखिक या लिखित अनुबंध के आधार पर वर्षभर उनके लिए मजदूरी करते हैं. मेनका रोजगार स्थाई होता है. लेकिन यह अनुबंध भी मौखिक होने के कारण अस्थाई होते हैं.

परिणाम स्वरूप बाकी राज्यों में इन लोगों का पलायन होता रहता है इनके पास ने अपनी छत होती है और ना ही दूसरे राज्य का राशन कार्ड. परिणाम स्वरूप मैं किसी भी प्रकार की योजना का लाभ नहीं मिल पाता है.

सामाजिक असुरक्षा
सामाजिक सुरक्षा की बात करना ही इन लोगों के लिए बेमानी है. ठीक है सुरक्षा का खतरा तो हर समय बना ही रहता है. साथ ही इन लोगों के शोषण का भी बना रहता है. हरिजन मजदूरों के साथ तो अक्सर गांव में भी भेदभाव होता है. उन्हें अवसर और संसाधनों से वंचित रखा जाता है.

हमारे देश में सरकारी नीतियों में सात्मक कार्यों का अभाव है जो छोड़ गेम बनाए भी गए हैं वह नहीं होते. मजदूरों की बीमार होने पर अथवा मजदूरी करते समय विकलांग होने पर उन्हें किसी भी प्रकार की सुरक्षा नहीं मिलती है जिससे वह मजदूरी करने के लायक भी नहीं रहते.

इस प्रकार उनके सामने जीवन मरण का प्रश्न उठ खड़ा होता है. हमारे देश में कुल आय का 50 परसेंट योगदान देने वाला समूह सबसे अधिक है मानवीय व्यवहार कम भुगतान आर्थिक और सामाजिक शोषण का शिकार है.

सरकारी नीतियों में इस वर्ग को सामाजिक एवं आर्थिक सुरक्षा देने की प्राथमिकता होनी चाहिए. जिससे यह शोषित और वंचित वर्ग भी अपना जीवन यापन भी सुचारू ढंग से चला सके. यह सब उपाय करने के बाद ही यह वर्ग समाज की मुख्यधारा में अपने को शामिल कर पाएगा. और खुशहाल जीवन व्यतीत कर सकेगा.


हिंदुस्थान समाचार/ कर्मवीर सिंह तोमर