कर्नाटक का नाटक रचेगा नया इतिहास !

उमेश चतुर्वेदी

जब से केंद्र में नरेंद्र मोदी की अगुआई में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी है. विपक्ष की तरफ से सरकार पर हर बार आरोप लगाया जाता है कि केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट, चुनाव आयोग और दूसरी संवैधानिक संस्थाओं की साख खत्म कर रही है. 

कर्नाटक में कुमार स्वामी सरकार पर आए संकट को जिस तरह कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर की संविद सरकार निबट रही है, उससे साफ है कि राज्य सरकार और दोनों ही पार्टियों को न तो सुप्रीम कोर्ट की परवाह है और ना ही राज्यपाल की. 

राज्य में आए संवैधानिक संकट के बाद कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर से बागी हुए विधायकों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला दिया, उस पर विधानसभा के अध्यक्ष रमेश कुमार द्वारा पालन होता नजर नहीं आया. 

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जिन विधायकों ने अपनी पार्टियों से इस्तीफा दे दिया है, उन्हें विधानसभा की कार्यवाही में भाग लेने या वोट देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता. 

सुप्रीम कोर्ट ने उनके इस्तीफे पर विधानसभा स्पीकर को बृहस्पतिवार 18 जुलाई तक फैसला लेने का वक्त दिया था. लेकिन ऐसा नहीं हो पाया. 

राज्य विधानसभा का सत्र 12 जुलाई से शुरू हुआ है. इस विधानसभा सत्र के ठीक पहले कांग्रेस के 16 और जनता दल सेक्युलर के तीन एवं एक निर्दलीय विधायक ने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया. 

इसकी वजह से 225 सदस्यीय विधानसभा की प्रभावी संख्या 205 ही रह गई है. ऐसे में कुमार स्वामी की अगुआई वाली सरकार अल्पमत में आ गई है.

उसके पास जहां जनता दल सेक्युलर के सिर्फ 34 विधायकों का समर्थन रह गया है, वहीं कांग्रेस के भी सिर्फ 63 विधायक ही रह गए हैं. ऐसे में 105 सदस्यों वाली बीजेपी प्रभावी संख्या के लिहाज से विधानसभा में बहुमत में आ गई है. 

वहीं कुमार स्वामी सरकार ने इस्तीफा देने की बजाय विश्वासमत का सामना करने की रणनीति बनाई है. 

पूरा लेख पढ़ें युगवार्ता के 28 जुलाई के अंक में…

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