#WORLDBLOODDONORDAY : स्वैच्छिक रक्तदान में पीछे हैं भारतीय!

किसी स्वस्थ व्यक्ति के रक्त की कुछ बूंदें किसी मरते हुए व्यक्ति की जान बचा सकती हैं. रक्त का कोई विकल्प नहीं है, रक्त अनमोल है. इसीलिए रक्तदान को महादान माना जाता है. 

हर दूसरे सेकण्ड में दुनिया भर में कोई न कोई जिंदगी मौत से जूझ रही होती है, ऐसे में हमारा रक्तदान किसी को जीवनदान दे सकता है. 

मगर जागरूकता के अभाव में देश में स्वैच्छिक रक्तदाताओं का आंकड़ा कुल आबादी का एक प्रतिशत भी नहीं पहुंच पाया है.  बताते चलें कि 1997 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सौ फीसदी स्वैच्छिक रक्तदान की शुरूआत की थी. 

इसके तहत 124 प्रमुख देशों का समूह बनाकर सभी देशों से स्वैच्छिक रक्तदान को बढ़ावा देने की अपील की गयी. इस पहल का मुख्य उद्देश्य था कि किसी भी नागरिक को रक्त की आवश्यकता पड़ने पर उसे पैसे देकर रक्त न खरीदना पड़े. 

इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए अब तक 49 देश स्वैच्छिक रक्तदान को अमलीजामा पहना चुके हैं. हालांकि कई देशों में अब भी रक्तदान के लिए पैसों का लेनदेन होता है जिसमें भारत भी शामिल है. 

विश्व स्वास्थ्य संगठन(WHO) के मानक के तहत भारत में सालाना एक करोड़ यूनिट रक्त की जरूरत है लेकिन 75 लाख यूनिट रक्त ही उपलब्ध हो पाता है. 

राजधानी दिल्ली में आंकड़ों के मुताबिक यहां हर साल 350 लाख रक्त यूनिट की आवश्यकता रहती है लेकिन स्वैच्छिक रक्तदाताओं से इसका महज 30 फीसदी ही जुट पाता है. कमोवेश यही स्थिति समूचे देश की है. 

भले ही देश में रक्तदान को लेकर विभिन्न संस्थाओं व व्यक्तिगत स्तर पर उठाए गए कदम भारत में स्वैच्छिक रक्तदान को बढ़ावा देने में कुछ कारगर हैं.

मगर खेद का विषय है कि भारत की आबादी भले ही सवा अरब पार कर गयी हो मगर रक्तदाताओं का आंकड़ा कुल आबादी का एक प्रतिशत भी नहीं पहुंच पाया है. 

विशेषज्ञों के अनुसार भारत में कुल रक्तदान का 59 फीसद स्वैच्छिक होता है. राजधानी दिल्ली में तो स्वैच्छिक रक्तदान महज 32 फीसदी है. 

एक अनुमान के अनुसार दिल्ली में तकरीबन पांच दर्जन ब्लड बैंक हैं फिर भी एक लाख यूनिट रक्त की कमी है. इसकी मूल वजह है इस दिशा में समाज में फैली अज्ञानता.

पूरा लेख पढ़ें युगवार्ता के 16 जून के अंक में…

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