गांधी का इंडियन ओपिनियन

भानु कुमार

आम लोगों तक पहुंचने के लिए ‘इंडियन ओपिनियन’ महात्मा गांधी का पहला प्रयोग था. वे कलम के जरिए लोगों तक अपनी पहुंच बना रहे थे. उन्होंने बतौर संपादक बड़ी कुशलता के साथ इंडियन ओपिनियन का उपयोग लोगों तक पहुंचने के लिए किया.

इसमें दोराय नहीं है कि प्रवासी भारतीयों के बीच इस पत्र के माध्यम से एक मजबूत स्थान बनाने में वे पूरी तरह सफल हुए. फिर यहीं से अंग्रेजी हुकूमत को सत्य से परिचय कराने का काम शुरू किया.

‘इंडियन ओपिनियन’ का प्रकाशन 1903 में गांधीजी की प्रेरणा से प्रारंभ हुआ था. इस पत्र के संस्थापक मदनजीत थे. 4 जून, 1903 की बात है, जब इंडियन ओपिनियन का पहला अंक आया था.

तब यह पत्रिका चार भाषाओं में निकलती थी, जिनमें अंग्रेजी, हिन्दी, तमिल और गुजराती भाषा शामिल थी. गांधी के अनुसार इस पत्रिका के तीन उद्देश्य थे.

पहला उद्देश्य यह था कि दक्षिण अफ्रीका में रहने वाले प्रवासी भारतीयों का दुख शासन चलाने वाले गोरे अंग्रजों को मिले. इसके साथ-साथ प्रवासी भारतीय भी अपनी परेशानी की वजह को समझें.

दूसरा कारण यह था कि प्रवासी भारतीयों को अपने दोषों के बारे में अवगत कराना ताकि वे स्वयं में सुधार कर सकें. पत्रिका का तीसरा लक्ष्य यह था कि हिन्दू मुस्लिम के साथ-साथ क्षेत्रीयता के भेदभाव को समाप्त करना.

मूल इन्हीं तीन उद्देश्यों को ध्यान में रखकर इंडियन ओपिनियन की शुरूआत हुई थी. सही कहा जाए तो प्रवासी भारतीयों का यह पहला मुखपत्र था. पत्रिका के पहले पादक मनसुखलाल नाजर थे.

लेकिन लेखनी का जिम्मा स्वयं गांधीजी ने उठाया था. हालांकि, बतौर लेखक गांधीजी का नाम नहीं लिखा जाता था.

पहले अंक में ही गांधी ने ‘अपनी बात’ नामक कॉलम लिखते हुए यह स्पष्ट कर दी थी कि दक्षिण अफ्रीका में रहने वाले प्रवासी भारतीय ब्रिटिश हुकूमत के निर्जीव अंग नहीं हैं.

इसलिए अपनी बातों और शिकायतों को सामने रखने के लिए प्रवासियों के इस पत्र को अनुचित नहीं समझा जाना चाहिए. इसी अंक में ‘क्या यह न्याय है?

‘में उन्होंने लिखा था- ‘अगर एक यूरोपीय कोई जुर्म या नैतिक भूल करता है तो वह एक व्यक्ति का दोष समझा जाता है.

पूरा लेख पढ़ें नवोत्थान के जून अंक में…

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