भारत-ईरान धूल चटाएं धूर्त पाक को

सच में भारत और ईरान को जोड़ता है बीच में खड़ा पाकिस्तान. लेकिन ये दोनों देश पाकिस्तान के अंदर चलने वाली आतंक की फैक्ट्रियों से लहूलुहान हैं. ये फैक्ट्रियां भारत और ईरान में लगातार आतंक फैला रही हैं.

पुलवामा की भयावह घटना के दौरान ही ईरान में भी एक आत्मघाती हमले में 27 ईरानी सैनिक मारे गए. ईरान का आरोप है कि उस आत्मघाती हमले में भी पाकिस्तान का ही हाथ है. इस घटना से सारे ईरान में भी पाकिस्तान के खिलाफ जबरदस्त आक्रोश है. ईरान ने अपने सुरक्षा बलों पर हुए आत्मघाती हमले के पीछे मौजूद एक जिहादी संगठन को पनाह देने का इस्लामाबाद पर खुला आरोप लगाया है.

पाकिस्तान और ईरान के बीच 900 किलोमीटर की सीमा है. पाकिस्तान से ईरान इसलिए नफरत करता है, क्योंकि दोनों देशों की सीमा पर तैनात ईरान के सुरक्षाकर्मियों को पाकिस्तान के आतंकी मार कर भाग जाते हैं. साल 2015 में पाक के आतंकवादियों ने सैकड़ों सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया था. उसके बाद से ईरान में पाकिस्तान के मानव बमों के हमले लगातार होते रहे हैं.

इस बीच, पुलवामा में सीआरपीएफ के जवानों पर हमले के लिए पाकिस्तान में सक्रिय जहरीले आतंकवादी संगठन जैश –ए- मोहम्मद ने जिम्मेदारी ले ली है. सारा भारत तो मानता ही है कि पुलवामा हादसे के तार पाकिस्तान से ही जुड़े हैं. यानी दोनों देश पाकिस्तान से फैलाए जा रहे आतंकवाद से त्रस्त हैं.

अब भारत-ईरान के पास विकल्प भी कुछ अधिक नहीं बचे हैं. दोनों को पाकिस्तान से कूटनीति से लेकर हर स्तर पर लड़ना ही होगा. उसे ऐसी गहरी चोट देनी होगी कि पाकिस्तान ही नहीं विश्व भर के आतंकी आतंकवाद का नाम लेने से ही कांप जायें. अब पाकिस्तान की निंदा या कड़ी निंदा करने का वक्त तो गुजर चुका है.

भारत के कड़े रुख के चलते पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान भी कहने लगे हैं कि “जंग से क्या होगा. हम आतंकवाद पर बात करने के लिए राजी हैं.” लेकिन, अब बात करने पर हम तो राजी नहीं हैं न ? लात के देवता बातों से कहां सुनेंगें. अब तो उन्हें इतनी लात पड़नी जरूरी है कि वे जिन्दा दफन हो जायें.

दरअसल, ईरान के पाकिस्तान से सटे दक्षिण-पूर्वी सिस्तान में विगत 13 फरवरी को एक आत्मघाती हमले में रिवोल्यूशनरी गार्ड के 27 सदस्य मारे गये थे. सुन्नी जिहादी संगठन जैश अल-अदल (न्याय की सेना) ने हमले की जिम्मेदारी ली है. तो कहीं जैश ए मोहम्मद है, तो कहीं जैश अल-अदल है.

भारत-ईरान का पाकिस्तान के खिलाफ साथ-साथ मिलकर रणनीति बनाना जरूरी है. पाकिस्तान को दोनों तरफ से दबाकर कुचल देने की जरूरत है. यह इसलिए भी आवश्यक है कि पाकिस्तान ऐसे तो कभी नहीं सुधरेगा. उसके खून में भारत और ईरान के खिलाफ अलग-अलग कारणों से नफरत है.

हाफिज सईद और मौलाना अजहर महमूद जैसे कुख्यात आतंकी पाकिस्तान में फल-फूल रहे हैं. उन्हें पाकिस्तान सरकार और सेना का पूर्ण संरक्षण प्राप्त है. वास्तव में ये ही भारत के ऊपर आतंकी हमले करवाने की रणनीति बनाते हैं. इन्हें भारत ने मुंबई हमलों से पठानकोट और पुलवामा तक देखा है.

अगर बात ईरान और पाकिस्तान के बीच संबंधों की करें तो उसमें बड़ा बदलाव तब आया था जब दिसंबर, 2015 में सऊदी अरब ने आतंकवाद से लड़ने के लिए 34 देशों का एक ‘इस्लामी सैन्य गठबंधन’ बनाने का फैसला किया था. हालांकि उसमें शिया बहुल ईरान को शामिल नहीं किए गया था. उस गठबंधन में सऊदी अरब ने पाकिस्तान को प्रमुखता के साथ जोड़ा था.

इस कारण पाकिस्तान से ईरान काफी नाराज हुआ था. यह बात अलग है कि वो गठबंधन कभी कायदे से अपना काम ही नहीं कर सका. उस गठबंधन को ईरान विरोधी के रूप में भी देखा गया, जो सऊदी अरब का मुख्य क्षेत्रीय प्रतिद्वंदी है. इस बीच, 19 फरवरी को भारत आने से पहले सऊदी अरब के वली अहद (युवराज) मोहम्मद बिन सलमान ने पाकिस्तान की भी यात्रा की थी.

उस यात्रा पर ईरान की नजरें गड़ी थीं. क्योंकि ईरान और सऊदी अरब में कुत्ते-बिल्ली का बैर है. वैसे भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दोनों ही घोर प्रशंसक और मित्र हैं. पाकिस्तान मोटा-मोटी सऊदी अरब के साथ खड़ा होता है, पर वह ईरान से भी दूरी बनाकर नहीं रखना चाहता पर ईरान को मालूम है कि जिस देश में शियायों का कत्लेआम होता हो, वह देश उसका मित्र हो ही नहीं सकता.

बहरहाल, अब भारत-ईरान को साथ मिलकर पाकिस्तान को हर स्तर पर घेरना होगा. यह एक विचित्र संयोग है कि पिछले साल भी ईरान और भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ तगड़ा मोर्चा खोला था. भारतीय सेना ने आजाद कश्मीर में आतंकी शिविरों पर सर्जिकल स्ट्राइक किया था, उसी दिन ईरान ने भी पाकिस्तान पर हमला किया था.

उस रात भारतीय सेना ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में घुसकर 38 आतंकी मार गिराए थे. उसी समय पाकिस्तान की पश्चिमी सीमा पर ईरान ने मोर्टार दागे थे. ईरान के बॉर्डर गार्ड्स ने सरहद पार से बलूचिस्तान में मोर्टार दागे थे.

यकीन मानिए कि ईरान-पाकिस्तान के बीच संबंध कभी भी सामान्य नहीं होंगे. पाकिस्तान पक्का चमचा है ईरान के शत्रु सऊदी अरब का. ईरान-पाकिस्तान में इसलिए भी तनातनी रही है, क्योंकि ईरान शिया देश है, तो पाकिस्तान कट्टर सुन्नी मुस्लिम देश है. पाकिस्तान की सऊदी अरब से नजदीकियां कभी भी ईरान को रास नहीं आई हैं.

हैरानी होती है कि पाकिस्तान से तो उसके सभी पड़ोसी देश नाराज ही हैं. अफगानिस्तान की ही बात कर लीजिए. अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच दशकों से लगातार तनाव चल रहा है. हालांकि, वह भी इस्लामिक देश है. काबुल भी पाकिस्तान पर अक्सर यह इल्जाम लगाता है कि वह आतंकियों को अपनी जमीन पर सुरक्षित ठिकाने मुहैया कराता रहा है.

इसके साथ ही तालिबानियों को अपनी सीमा में दाखिल कर अफगानी और पश्चिम देशों की सेना पर हमले करवाता रहा है. और तो और, बांग्लादेश भी जो कभी उसका अपना अंग था, भी पाकिस्तान को फूटी नजर नहीं देख पाता. कारण यह है कि बांग्लादेश को पाकिस्तान से शिकायत है कि वह उसके घरेलू मामलों में दखल देता है.

बांग्लादेश बार-बार कहता रहा है कि वो पाकिस्तान की ओर से उसके आतंरिक मसलों में हस्तक्षेप को सही नहीं मानता. बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना की पाकिस्तान से शिकायत रही है कि तन-बदन में आग तो तब लग जाती है, जब बांग्लादेश में 1971 के मुक्ति संग्राम के गुनाहगारों को फांसी दी जाती है. उन्हें दंड दिया जाना पाकिस्तान को बुरी तरह खल जाता है.

1971 के कत्लेआम के मुद्दे पर पाकिस्तान-बांग्लादेश के रिश्ते लगातार खराब हो रहे हैं. जरा सोचिए कि पाकिस्तान उस कत्लेआम के गुनाहगारों के साथ खड़ा रहता है. अब समझ लीजिए उसका चरित्र किस तरह का है पर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खां बातें-दावें करते हैं कि वो आतंकवाद से लड़ने को तैयार हैं. जिस देश से ओसामा बिन लादेन मिला हो, उसकी बातों पर यकीन कौन करेगा? अब वक्त का ताकाजा है कि भारत-ईरान मिलकर पाकिस्तान को धूल चटाएं.

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