भारतीयता के उत्सव की ओर

मालविका जोशी

स्वतंत्रता मिलने के 70 सालों बाद तक हम एक अजीब से दुविधा में जी रहे हैं. इस दुविधा की नींव हमारे संविधान से ही पड़ी, जिसमें लिखा है, ‘‘इंडिया दैट इज भारत’’.

इन सत्तर सालों में हम लगातार इसी द्वंद में जी रहे हैं कि हम इंडिया हैं या भारत! स्थितियां इतनी बदतर न होतीं यदि इसी बीच उदारीकरण और वैश्वीकरण की आंधियों को हमने न झेला होता.

इन आंधियों के जरिये वो तमाम समीकरण गड़बड़ा गये जिनके चलते इंडिया और भारत के बीच किसी तरह तालमेल बैठाने की कोशिश हमारे हुक्मरान करते रहे हैं.

उदारीकरण और वैश्वीकरण की आंधियां इतनी तेज थी कि इंडिया और भारत के बीच का संतुलन पूरी तरह बिगड़ गया और इंडिया बड़ी तेजी से भारत से दूर होता चला गया.

बात यदि यहीं तक सीमित रहती तब भी ठीक था. किसी तरह फिर भी बचाया जा सकता था भारतीयता को. लेकिन जब इंडिया का दबाव लगातार भारतीय अस्मिता पर पड़ने लगा और दूसरे प्रलोभन कहीं अधिक चमकदार नजर आने लगे तो भारत का अस्मिता बोध धुंधला पड़ने लगा.

इतना धुंधला कि एक समय तक तो ऐसा लगने लगा मानो इंडिया समूचे भारत को लील गया हो. दु:ख इस बात का तो था ही कि हमारी अस्मिता के साथ ऐसा खेल हो रहा है. दु:ख इस बात का भी था कि अल्पसंख्यक इंडियन मिलकर बहुसंख्य भारतीयों के साथ ऐसा कर रहे थे.

इस समूची प्रक्रिया में जहां हमारा आचार व्यवहार, जीवन पद्धति प्रभावित हुई, वहीं हमारी शिक्षा और संस्कृति भी उससे प्रभावित हुई. तकनीक या अधोरचना जहां हमारी जीवन शैली को बदल सकते हैं, वहीं संस्कृति और शिक्षा हमारे जीवन दर्शन को प्रभावित करते हैं.

इस दृष्टि से हम एक ऐसे दौर में पहुंच रहे थे जहां शिक्षा और संस्कृति पूरी तरह उस ‘‘इंडिया’’ के प्रभाव क्षेत्र में आ गई थी जिसने भारत को बुरी तरह लील डाला था.

पूरा लेख पढ़ें युगवार्ता के 16-30 अप्रैल के अंक में…

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