भारत-चीनः विचित्र स्थिति

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

चीन को लेकर अत्यंत विचित्र स्थिति है. क्या भारत चीन के साथ फौजी संघर्ष चाहता है या बातचीत से सीमाई तनातनी खत्म करना चाहता है या कोई उसकी भावी लंबी-चौड़ी रणनीति है? भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अभी तक चीन का नाम लेकर उसके विरुद्ध एक शब्द भी नहीं बोला है.

उन्होंने जो बोला है, उसे दोहराने की हिम्मत भारत का कोई नेता नहीं कर सकता है. वे शायद भारतीय जवानों के पराक्रम और बलिदान की प्रशंसा करना चाहते थे. इसीलिए उन्होंने कह दिया कि भारत की सीमा में कोई नहीं घुसा और हमारी जमीन पर कोई कब्जा नहीं हुआ.

सरकार, बीजेपी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने चीनी माल के बहिष्कार की कोई अपील भी जारी नहीं की है. इससे भी बड़ी बात यह कि भारत और चीन के कोर कमांडर गालवान घाटी में 10-10, 12-12 घंटे बैठकर तीन बार बात कर चुके हैं और दोनों पक्ष कह रहे हैं कि वे पीछे हटने के तौर-तरीकों पर बात कर रहे हैं.

बात सफल भी हो रही है लेकिन अभी वह लंबी चलेगी. इस प्रगति का समर्थन चीन के बड़बोले और मुंहफट अखबार ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने भी किया है. इन बातों से आप किस नतीजे पर पहुंचते हैं? इन बातों में आप यह भी जोड़ लें कि अभी तक चीन के राष्ट्रपति और मोदी के मित्र शी जिनपिंग ने भारत के विरुद्ध एक शब्द नहीं बोला है. यानी सारा मामला धीरे-धीरे ठंडा हो रहा है लेकिन इसका उल्टा भी हो रहा है.

चीन ने कल ही सुरक्षा परिषद में भारत पर कूटनीतिक हमला करने की कोशिश की है. कराची में हुए बलूच हमले पर पाकिस्तान जो प्रस्ताव लाया, उसके समर्थन में भारत का नाम लिये बिना चीन ने भारत पर उंगली उठा दी है. गालवान घाटी के पास उसने हजारों सैनिक जमा कर लिए हैं. पाकिस्तान ने भी उसके आसपास के क्षेत्र में 20 हजार सैनिक डटा दिए हैं.

इधर भारत अपनी सभी सरकारी कंपनियों से हो रहे चीनी सौदों को रद्द करता जा रहा है. हमारी गैर-सरकारी कंपनियां भी चीनी पूंजी के बहिष्कार की बात सोच रही हैं. इससे भी बड़ी बात यह हुई कि भारत में लोकप्रिय 59 चीनी ‘एप्स’ पर भारत ने प्रतिबंध लगा दिया है. चीन इस पर बौखला गया है.

अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पोंपियो इस मामले में भारत की पीठ ठोंक रहे हैं. फ्रांस-जैसे कुछ राष्ट्रों ने, चाहे दबी जुबान से ही सही, भारत का समर्थन किया है. भारत की जनता इन परस्पर-विरोधी धाराओं का कुछ अर्थ नहीं निकाल पा रही है. हो सकता है कि दोनों देश एक-दूसरे पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दबाव बना रहे हैं.

आज दोनों इस स्थिति में नहीं हैं कि युद्ध करें. चीन तो कोरोना की बदनामी और हांगकांग की उथल-पुथल में पहले से ही फंसा हुआ है. भारत यदि चीन को सबक सिखाना चाहता है, तो ये तात्कालिक टोटकेबाजी काफी नहीं है. उसके लिए सुदीर्घ, गोपनीय और सुचिंतित रणनीति की जरूरत है.

(लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार और स्तंभकार हैं)

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