कैसे हों बिहार के राजमार्ग सुरक्षित- आर के सिन्हा

66
Share on facebook
Facebook
Share on twitter
Twitter
Share on whatsapp
WhatsApp

आर.के. सिन्हा

आज से तीस साल पहले की तुलना में देश की आबादी ने एक स्थान से दूसरे स्थान पर आना-जाना बहुत अधिक कर दिया है. जनता अपने करियर को पंख लगाने के लिए एक शहर से दूसरे शहर में बसने या कामकाज के सिलसिले में जाने लगी है. इसके चलते राजमार्गों पर यातायात भी बहुत बड़ा है. जो लोग हवाई मार्ग या रेल के रास्ते अपनी मंजिल तक नहीं जाते, वे स़ड़क मार्गों का ही सहारा लेते हैं. सड़कों से माल ढुलाई का काम तो होता ही है.

देश में सबसे बड़ा हाईवे का नेटवर्क उत्तर प्रदेश में है. राज्य में 8,483 किलोमीटर लंबा हाईवे है. उसके बाद नंबर आता है बिहार का. वहां राष्ट्रीय राजमार्ग की लंबाई 4,967 किलोमीटर है. बाकी राज्यों में भी हाईवे की लंबाई अच्छी खासी है. भारत में आज के दिन करीब एक लाख किलोमीटर लंबा नेशनल हाईवे का जाल बिछा हुआ है.

होगा राजमार्गों का कायाल्प

इस बीच, बिहार के लिए यह अच्छी खबर आई है कि वहां 14 हजार करोड़ रुपए की राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं की आधारशिला रखी गई है. इस राशि से बिहार के राजमार्गों का विस्तार होगा. राजमार्ग परियोजनाओं में 3 बड़े ब्रिज और राजमार्गों को चार लेन तथा 6 लेन में अपग्रेड किया जाना शामिल है.

बिहार में अब सभी नदियों पर पुल तो होंगे ही और सभी प्रमुख राष्ट्रीय राजमार्गों के चौड़ीकरण का काम होगा. इस समय बिहार में राष्ट्रीय राजमार्ग का काम तेज़ी से किया जा रहा है. पूर्वी बिहार को पश्चिमी बिहार से जोड़ने के लिए चार लेन की 5 परियोजनाओं और उत्तर बिहार को दक्षिण बिहार से जोड़ने के लिए 6 परियोजनाओं पर काम चल रहा है.

बेशक, बिहार में आवागमन में सबसे बड़ी बाधा बड़ी नदियों के चौड़े पाट और तेज बहाव के चलते थी, इसीलिए बिहार के विकास के लिए प्रधानमंत्री पैकेज की घोषणा में पुलों के निर्माण को विशेष तौर पर ध्यान में रखा गया था. इसके अंतर्गत गंगा नदी पर 17 पुलों का निर्माण किया जा रहा है जिसमें से अधिकांश पूर्ण होने के चरण में है.

इसी तरह से गंडक और कोसी नदियों पर भी पुलों का निर्माण किया जा रहा है. पटना रिंग रोड और पटना में गंगा नदी पर महात्मा गांधी सेतु के समानांतर तथा विक्रमशिला सेतु के समानांतर पुलों के निर्माण से पटना और भागलपुर के बीच संपर्क में उल्लेखनीय सुधार होगा.

ताकि सुरक्षित हो राजमार्ग

देखिए एक बात तो समझ लेनी चाहिये कि हाई-वे के निर्माण के बाद यह भी बिहार सरकार को सुनिश्चित करना होगा कि उन पर सफर करने वालों को किसी सड़क हादसों से दो-चार न होना पड़े. उत्तर प्रदेश और बिहार से गुजरने वाले हाईवे ही देश के सबसे असुरक्षित हैं. इन पर भीषण हादसों से लेकर हत्याएं और लूटपाट होना तो आम बात है.

नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों पर गौर करें तो यह समझ आ ही जाएगा कि उत्तर प्रदेश और बिहार के हाईवे कितने असुरक्षित हो चुके हैँ. इनके बाद क्रमश: उड़ीसा, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश का नंबर आता है. हाईवे पर होने वाले अपराध पुलिस के लिए अब एक नया सिरदर्द बन रहे हैं. तो कैसे थमे इन पर होने वाले अपराध और हादसे?

इसका यही उपाय समझ आता है कि अपराधियों के मन में पुलिस का खौफ हो. वे अपराध को अंजाम देने से पहले दस बार सोचें. इसी तरह से हाईवे पर तयशुदा रफ्तार से ज्यादा स्पीड से अपने वाहन चलाने वालों पर भी कैमरों की नजर हो. हाईवे पर यातायात के नियमों का पालन न करने वालों पर कठोर दंड हो. उनके लाइसेंस कैंसिल कर दिए जाएं. कठोर एक्शन लिए बगैर तो हाईवे सुरक्षित नहीं होने वाले.

योजना है कि कोरोना काल के बावजूद इस साल के अंत तक बिहार के सभी हाईवे पर तेजी से गाड़ियां दौड़ें. इसके लिए पटना, मुजफ्फरपुर, दरभंगा, गया,भागलपुर, मुंगेर, बिहारशरीफ, आरा, समस्तीपुर, मधुबनी, छपरा, सिवान, गोपालगंज शहर में बाईपास निर्माण भी किये जा रहे है. ऐसे में इन हाईवे के निर्माण लागत के साथ ही चौड़ीकरण के उपयोग में आने वाली जमीन के अधिग्रहण की लागत भी तो सरकार वहन कर रही है.

हाईवे का अर्थ होता है उन सड़कों से जिनसे वाहन बिना ठहराव के अपनी मंजिल की तरफ जा सकता है. पर अगर इन पर वाहनों की तादाद तेजी से बढ़ जाए और ये अपराधियों के स्वर्ग बनने लगें तो फिर उसके पूर्व ही कारगर कदम उठाए जाने चाहिए. इसलिए देश के हाईवे को हर लिहाज से सुरक्षित तो बनाना ही होगा.

केंद्र सरकार की चाहत है कि बहरहाल, देश बुनियादी क्षेत्र के विकास पर जितना काम हो रहा है और जिस गति से इस काम को निपटाया जा रहा है वह तो अतुलनीय है. फिलहाल राजमार्गों के निर्माण की गति 2014 से पहले के मुकाबले में दोगुनी हो गई है. 2014 से पहले की तुलना में राजमार्ग निर्माण पर खर्च भी अब 5 गुना बढ़ा दिया गया है. सरकार ने आगामी 5 वर्षों के भीतर बुनियादी ढांचागत विकास पर 110 लाख करोड़ रुपए खर्च करने की घोषणा की है. इसमें 19 लाख करोड़ रुपए राजमार्गों के विकास के लिए ही समर्पित हैं.

एक बात जान लें कि किसी भी देश की प्रगति की रफ्तार को जानने के लिए उसके हाईव को देख लेना चाहिए. अमेरिका में एक कहावत प्रचलित है, – ” अमेरिका की सड़कें इसलिये शानदार नहीं हैं क्योंकि अमेरिका एक महान राष्ट्र हैI बल्कि, यह कहना उचित होगा कि अमेरिका एक महान राष्ट्र है क्योंकि अमेरिका की सड़कें शानदार हैंI”

माफ करें हमारे देश में राजमार्गों के विस्तार पर बड़े स्तर पर काम अटल बिहारी वाजपेयी की दूरदृष्टि के चलते ही शुरू हो पाया. अटल बिहारी वाजपेयी ने साल 1996 में प्रधानमंत्री बनते ही देश के चार बड़े महानगरों दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई को चार से छह लेन वाले राजमार्गों के नेटवर्क से जोड़ने की एक महत्वकांक्षी योजना बनाई.

इसे नक्शे पर देखेने पर यह राजमार्ग चतुर्भुज आकार का दिखता है और इसी वजह से इस योजना को “स्वर्णिम चतुर्भुज” नाम दिया गया. इस पर साल 1999 में काम चालू हुआ और साल 2001 में इस पर काम का श्रीगणेश भी हो गया. यह परियोजना साल 2012 में पूर्ण हुई. स्वर्णिम चतुर्भुज योजना के तहत बने राष्ट्रीय राजमार्ग की कुल लंबाई 5,846 कि.मी. है. इसके निर्माण में लगभग 6 खरब रुपए का खर्च आया था.

आप कह सकते हैं कि अटल जी ने जिस परियोजना को चालू किया था उसी ने वस्तुतः देश में हाई-वे के विस्तार की नींव को रखा जिसे मौजूदा मोदी सरकार गति दे रही है. यह संयोग ही है कि नितिन गडकरी जैसा उत्साही और कार्य कुशल कर्मठ मंत्री मोदी सरकार में सड़क एवं परिवहन मंत्रालय को देख रहे हैं. उन्होंने अपने मंत्रालय की छवि को चमका दिया है. वे रिजल्ट देने वाले मंत्रियों में हैं. बहरहाल, देश उम्मीद करता है कि उनके हाई-वे का विस्तार का काम तेजी से जारी रहेगा.

(लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तभकार और पूर्व सांसद हैं)