वोट बटोरने का सुगम तरीका

बद्रीनाथ वर्मा

रोजगार एक ऐसा सार्वकालिक मुद्दा है जिस पर विपक्ष आक्रामक मुद्रा में रहता है. और सत्तासीन दल बैकफुट पर. रोजगार का संबंध सीधे लोगों से जुड़ा होने के कारण चुनाव के दौरान इसका दोहन करने के लिए लंबे चौड़े वादे किये जाते हैं. 

बड़े-बड़े सपने दिखाये जाते हैं. हालांकि यह ऐसा वादा है जो कभी पूरा तो नहीं होता, लेकिन हां, हर चुनाव में रक्तबीज की तरह नये सिरे से पैदा जरूर हो जाता है. यानी कह सकते हैं कि गरीबी हटाओ की तरह ही यह भी महज एक कर्णप्रिय चुनावी नारा बनकर रह गया है. 

इस बार भी यह चुनावी मुद्दा बनेगा, इसमें किसी को कोई शक नहीं रहना चाहिए. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को घेरने के लिए विपक्ष अक्सर जिन मुद्दों पर शोर मचाता है, उनमें से एक है रोजगार. 

रोजगार को लेकर हल्ला बोलने के क्रम में यह भुला दिया जाता है कि बेरोजगारी की समस्या कोई 2014 के बाद की नहीं है. सच तो यह है कि बेरोजगारी को बढ़ाने में प्रत्येक सरकार का अपना-अपना योगदान है. 

चाहे वह कांग्रेस की अपनी सरकार रही हो या कोई मिलीजुली सरकार. बेरोजगारी एक ऐसी सच्चाई है जिसका कोई फुलप्रुफ समाधान कोई भी सरकार अभी तक खोज नहीं पाई है. 

बहरहाल, रोजगार के मुद्दे पर विपक्ष के निशाने पर रही मोदी सरकार के लिए अभी हाल ही में एक राहत की खबर आई. केन्द्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) ने एक रिपोर्ट जारी कर कहा है कि देश में रोजगार की हालत में गुणात्मक सुधार हुआ है. 

हालांकि मोदी सरकार के सिर पर ठीकरा फोड़ने को उतारू विपक्षी पार्टियां इस तरह की एजेंसियों की ओर से जारी की जाने वाली रिपोर्टों को दरकिनार कर देने में ही अपना भला समझती हैं. 

ऐसा इसलिए किया जाता है क्योंकि ये आंकड़े उनके एजेंडे में फिट नहीं बैठते. वैसे यह कहना समीचीन होगा कि देश में 45 साल में सबसे अधिक बेरोजगारी बढ़ने का दावा करते हुए छाती पीट चुके राजनीतिक दलों अभी हाल ही में आई सीएसओ की रिपोर्ट को भी जरूर देखना चाहिए. 

पढ़े पूरा लेख युगवार्ता के 07 अप्रैल के अंक में… 

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