ऐतिहासिक धरोहरों का खजाना है महावीर वन्य जीव विहार, ये हैं इतिहास से जुड़े रहस्य

नई दिल्ली: ललितपुर के महावीर वन्य जीव विहार में आकर तो ऐसा लगता ही नहीं है कि ये सूखी धरती वाले बुन्देलखण्ड का हिस्सा है. जैव विविधता वाले इस प्राकृत आवास को ईको पर्यटन के बड़े स्थल के तौर पर विकसित किया जा रहा है.

यहां पर भगवान महावीर वन्य जीव अभयारण्य के अंदर एक जैन मंदिर, वराह मंदिर, सिद्ध की गुफा, नाहर घाटी, राज घाटी और बेतवा नदी का मनोरम दृश्य है. ये सभी सदियों पुराने हैं. इसके साथ ही बेतवा के किनारे पर प्राकृतिक चट्टानों से बने घाट पर चट्टानों की दीवारों पर कई प्रतिमाएं उकेरी गई हैं. ब्राह्मी लिपि में एक अभिलेख भी लिखा हुआ है.

जैन मन्दिरों का समूह क्षेत्र– कहा जाता है कि यहां कुल 40 जैन मंदिर और थे, जिनमें से छोटे बड़े मिलाकर कुल 31 अभी भी बचे हुए हैं. जो भारतीय स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना हैं. विन्ध्य पर्वत माला पर जैन मन्दिरों का ये समूह इस क्षेत्र को अति विशिष्ट बनाता है. इनमें अनगिनत शिलालेख, मानस्तम्भ, भगवान भरत, बाहुबली तथा आदिनाथ, शान्तिनाथ, पार्श्वनाथ, महावीर आदि चौबीस तीर्थकरों तथा चक्रेश्वरी, अम्बिका, पदमावति, सरस्वती, लक्ष्मी आदि यक्षियों की अद्वितीय सैकड़ों प्रतिमाएं दर्शनीय हैं.

भगवान शान्तिनाथ की प्रतिमा- जैन मन्दिर समूह में मन्दिर नम्बर 12 अपनी विशालता और भगवान शान्तिनाथ की प्रतिमा के कारण बेहद महत्वपूर्ण है. भगवान शान्तिनाथ की प्रतिमा ऊंचाई, समय और अपने कलात्मक गुणों के कारण बेहद गौरवशाली है. प्रतिमा के आभामण्डल को देखते हुए गुप्तकाल के शिल्पियों की कला की तारीफ करते हुए लोग नहीं थकते.

गर्भगृह में भगवान शान्तिनाथ के दोनों और यक्षी अम्बिका की प्रतिमाएं हैं. पंचायतन शैली के इस विशाल मन्दिर की बाहरी दीवार पर 24 यक्ष-यक्षिणियों की सुन्दर कला-कृतियां बनी हुई हैं, जिनकी आकृतियों से भव्यता टपकती है.
साथ ही 18 लिपियों वाला लेख भी बरामदे में उत्कीर्णित है. इन्हीं सब कारणों से ये मंदिर सर्वश्रेष्ठ मंदिरों में से एक माना जाता है.

पक्षियों से गुलजार- इसके साथ ही विन्ध्याचल के पहाड़ और बेतवा नदी की मौजूदगी के बीच यहां स्पोटेड डियर सहित तरह-तरह के वन्यजीव देखे जा सकते हैं. खैर, इन्द्रजौ, चन्दन और तेंदू के पेड़ से घिरी इस वन सेंचुरी में दुर्लभ व रंग बिरंगे पक्षियों की भी अपनी अलग दुनिया है, जो महावीर वन्य जीव विहार को बेहद खास बनाती है. इनमें जलीय पक्षी, नम भूमि के पक्षी, घास के पक्षी, स्थलीय पक्षी से लेकर शिकार पक्षी प्रमुख हैं.

इन पंछियों को वन्य जीव विहार में हर कोने-कोने पर फुदकते और आराम करते देखा जा सकता है. पर्पिल हेरोन, गेट इग्रेट, ग्रे हेरोन, लिटिल रिंग्ड प्लोअर, लॉफिंग डव, स्पोटेड डव, किंगफिशर, इण्डिन रौबिन, इण्डियन पोण्ड हेरन (अंधा बगुला), ब्रोन्ज विंग्ड जैकना (कटोई), ब्लैक ड्रोंगो (कोतवाल), मैना, कबूतर, तोता, बुलबुल, सुर्खाब बत्तख, चौबाहा, घोघिल, काला सिर का ढ़ोमरा, गजपांव, छोटा लालसर, ठेकरी सहित अन्य प्रकार के पक्षी इस वन क्षेत्र को बेहद खास बनाते हैं.

गिद्ध हैं यहां के विशेष पहचान– महावीर वन्य जीव विहार की एक प्रमुख पहचान यहां पाये जाने वाले गिद्ध हैं. प्रदेश में सर्वाधिक गिद्ध महावीर स्वामी वन्य जीव विहार में पाए जाते हैं. यहां बड़ी संख्या में गिद्धों के घोंसले देखे जा सकते हैं. इनके भोजन के लिए यहां विशेष इंतजाम करते हुए गिद्ध भोजन संग्रहालय बनाया गया है. इस तरह संरक्षण के इंतजामों के कारण यहां गिद्धों की संख्या में इजाफा भी हुआ है.

दशावतार मन्दिर– वन सेन्चुरी की यात्रा के दौरान आपको छठवीं सदी का दशावतार मन्दिर भी बेहद आकर्षित करेगा. पंचायतन शैली में निर्मित ये मन्दिर गुप्तकाल की धरोहरों में से एक है और इस शैली का उत्तर भारत में सबसे प्राचीन मन्दिर है.

हालांकि गर्भ गृह में भगवान की कोई मूर्ति नहीं है, लेकिन बाहरी दीवारों पर आपको दांपत्य प्रेम के साथ देव प्रतिमाओं की अनोखी मुद्रा वाली कलाकृतियां देखने को मिलेंगी, जो शिल्पकला की बेजोड़ विरासत मानी जाती हैं. दशावतार मन्दिर को इसलिए भी श्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि यहां रामायण और महाभारत की देव प्रतिमाओं का अनूठा संगम है. मूर्तियों में जहां द्रौपदी और पांडव एक साथ दर्शाए गए हैं, वहीं हाथी की पुकार पर सब कुछ छोड़ विष्णु प्रतिमा का भी एक-एक भाव अपने आप में नायाब है.

मुचकुंद गुफा- इसके साथ ही यहां की मुचकुंद गुफा से पौराणिक मान्यता जुड़ी है. कहा जाता है कि कालयवन से युद्ध के दौरान भगवान कृष्ण युद्ध भूमि छोड़कर इस गुफा में आये और तपस्यारत महाराज मुचकुंद को अपना पीताम्बर उड़ाकर छिप गये. उनके पीछे-पीछे आये कालयवन ने जब कृष्ण के भ्रम से महाराज मुचकुंद को उठाया, तो वरदान के प्रभाव से जैसे ही उन्होंने कालयवन को देखा वो भस्म हो गया.

इस घटना के बाद से रण छोड़ने के कारण ही कृष्ण रणछोर कहलाए. इस गुफा में ही उन्होंने महाराजा मुचकुंद को अपने पूर्ण स्वरूप के दर्शन दिए, तभी ये स्थान मुचकुंद गुफा कहलाई. इस गुफा से कुछ दूर बेतवा नदी के तट पर भगवान रणछोड़ का मंदिर भी है. इसके अलावा नाहर घाटी और रामघाटी भी है.

प्रदेश सरकार ने इस बात को समझते हुए अब ईको टूरिज्म के जरिए बुन्देलखण्ड के विकास का निर्णय किया है. इसके लिए जहां महावीर वन्य जीव अभ्यारण से जुड़े क्षेत्रों का तेजी से विकास कराया जा रहा है, वहीं पर्यटकों के ठहरने के लिहाज से सुविधाओं में वृद्धि पर जोर दिया गया है.

इन सबके बीच प्रकृति के इस अनमोल खजाने का व्यापक स्तर पर प्रचार-प्रसार भी किया जा रहा है. जिससे सैलानियों को इसके बार में जानकारी हो और वो यहां की ओर रुख कर सकें. प्रदेश सरकार की इस पहले से दोहरा लाभ होने का रास्ता खुला है. एक तरफ महावीर वाइल्फ लाइफ सेन्चुरी को ईको टूरिज्म के नक्शे पर नई पहचान मिलेगी, वहीं ज्यादा से ज्यादा पर्यटकों के यहां आने से स्थानीय स्तर पर रोजगार की सम्भावनाएं भी बढ़ेंगी.

साभार- युगवार्ता

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