हिमा ने परिस्थितियों को बनाया अपना “दास”

मोहम्मद शहजाद

प्रतिभा कभी परिस्थितियों की दास नहीं होती. उलटे परिस्थितियों को ही अपना दास बना लेती है. भारत की नई उड़नपरी हिमा दास इसकी जीती-जागती नजीर हैं.

उन्होंने जिन्दगी में कामयाब होने के लिए किसी चमत्कार का इंतजार नहीं किया बल्कि अपने जोश और जज्बे से एक महीने में पांच स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया है. 

भले ही वह आज एक के बाद एक सुनहरी सफलताएं हासिल कर स्वर्ण पदकों की झड़ी लगा रही हैं, लेकिन उन्हें ये सब हासिल करने में काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा.

असम के नौगांव जिले के छोटे से गांव ढिंग से निकल कर विश्व पटल पर अपना नाम दर्ज कराने वाली हिमा दास का जन्म 9 जनवरी 2000 को एक गरीब किसान परिवार में हुआ. 

पूरा परिवार धान की खेती करता है. हिमा के जीवन का भी अधिकतर हिस्सा इन्हीं खेतों में रोपाई-बुआई करते बीता. इसी दौरान उन्होंने खेतों की मेड़ और पगडंडियों पर नंगे पांव दौड़ लगानी शुरू कर दी. 

खेत की इन्हीं मेड़ों ने उनके लिए इंटरनेशनल रेस ट्रैक का रास्ता तय किया. वह रेस के मुकाबले में लड़कों से भी अव्वल रहती थीं. 

दोस्तों के अनुसार हिमा शुरू से जिद्दी स्वभाव की हैं और उनकी यह जिद खेल के मैदान में भी उनपर हावी रही है. उन्हें जीतने की जिद है. यही वजह है कि लड़के भी रेस में उनसे थक कर हार जाते थे.

मगर वह तब तक अड़ी रहती थीं जब तक अपने लक्ष्य को हासिन न कर लें. वह कई बार गांव में आने वाली गाड़ियों के साथ भी रेस लगाती थीं. इसमें भी वह नंगे पांव होने के बावजूद सबको पछाड़ देती थीं.

हिमा का बचपन से सपना फुटबॉलर बनने का था लेकिन मैदान में उनकी चुस्ती-र्फुती देखकर पीटी टीचर ने एथलेटिक्स में हाथ आजमाने की सलाह दी.

भारत में महिला फुटबॉल का बेहतर भविष्य न देखते हुए उन्होंने भी सलाह मान ली और अपने लिए रेस चुनी. गांव के उबड़-खाबड़ रास्तों, खेतों और पगडंडियों पर दौड़ लगाते रहने के कारण उनके अंदर यह प्रतिभा नैसर्गिक तौर पर मौजूद थी. 

यही वजह है कि उन्होंने स्थानीय स्तर पर हुए एथलेटिक्स मुकाबलों में ही झंडे गाड़ने शुरू कर दिए. हिमा के अंदर मौजूद बेहतरीन धावक के गुणों को निखारने और बाहर लाने के लिए उन्हें अच्छे प्रशिक्षण की दरकार थी .

पूरा लेख पढ़ें युगवार्ता के 04 अगस्त के अंक में…

Leave a Reply

%d bloggers like this: