थोड़ी देर में खुल जाएंगे कामाख्या देवी के कपाट, जानिए क्या है अंबुवाची मेले की खासियत
  • दरअसल मान्यता है कि 21 से 24 जून तक माता रजस्वला रहती हैं. इस दौरान मंदिर के गर्भ गृह में पूजा-अर्जना बंद रहती है
  • कहा जाता है कि माता जब रजस्वला होती हैं तो मंदिर के अंदर सवेद वस्त्र बिछाते हैं, तीन दिन बाद वो वस्त्र लाल हो जाता है

गुवाहाटी के कामाख्या देवी मंदिर में 22 जून से अंबुवाची मेला शुरू हो गया है. मेले की शुरूआत के साथ कामाख्या देवी मंदिर 3 दिन के लिए बंद कर दिया जाता है इसलिए आज सुबह सात बजे मंदिर के पट खुल जाएंगे. हर साल की तरह इस साल भी अधिक भक्तों के कामाख्या धाम आने की उम्मीद है.

दरअसल मान्यता है कि 21 से 24 जून तक माता रजस्वला रहती हैं. इस दौरान मंदिर के गर्भ गृह में पूजा-अर्जना बंद रहती है. कहते हैं कि इस समय ब्रह्मपुत्र नदी का जल भी लाल हो जाता है. चौथे दिन यानी 25 जून को देवी के स्नान पूजा के बाद मंदिर के कपाट खुल जाएंगे. इसके बाद भक्तों को प्रसाद में गीला कपड़ा मिलता है, जो अंबुबाची वस्त्र कहलाता है.

कहा जाता है कि माता जब रजस्वला होती हैं तो मंदिर के अंदर सवेद वस्त्र बिछाते हैं, तीन दिन बाद वो वस्त्र लाल हो जाता है. इस दौरान देश के विभिन्न जगहों से यहां तंत्रिक और साधक भी जुटते हैं.

अंबुबाची के समय कुछ विशेष सावधानी बरती जाती हैं. इस समय नदी में स्नान नहीं किया जाता है, जमीन या मिट्टी को खोदना नहीं चाहिए और न ही कोई बीज बोना चाहिए. इस दौरान शंख और घंटी भी नहीं बजाई जाती है.

क्या है इस मंदिर की खासियत

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान विष्णु ने जब देवी सती के शव को अपने सुदर्शन चक्र से काटा, तो उनके शरीर के 51 हिस्से धरती पर गिरे थे. वो टुकड़े जहां-जहां पर गिरे, वहां-वहां देवी के शक्तिपीठ स्थापित हुए. माता के योनी का भाग जहां पर गिरा वो कामरूप कहलाने लगा. बाद में ये कामाख्या शक्तिपीठ के नाम से दुनियाभर में प्रसिद्ध हो गया.

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