इंडो-पुतर्गाली परंपराओं और बेजोड़ वास्तुकला का मेल है गोवा

सुमद्री किनारे, हिप्पी नाइट लाइफ, फिल्म फेस्टिवल, बिंदास लाइफ स्टाइल से अलग गोवा कई संस्कृतियों का खूबसूरत मेल भी है. देश- विदेश से आने वाले सैलानियों का पसंदीदा पर्यटन स्थल गोवा को संस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से भी देखना अलग अनुभव है. बुधवार को पर्यटन मंत्रालय ने देखों अपना देश कार्यक्रम के तहत वेबिनार के माध्यम से गोवा की सैर करवाई जिसमें गोवा के उन पहलुओं के बारे में बताया गया जहां तक बहुत कम लोग पहुंच पाते हैं.

गोवा की विविधता की कहानी शहर और कस्बों में दिखाई देती है. शहर में जहां पुर्तगाली संस्कृति की झलक दिखाई देती है, तो गांवों में कोंकणी संस्कृति वहां की फिजाओं में रची बसी है. घरों की बनावट में इंडो पुर्तगाली वास्तुकला का खूबसूरत संगम देखते ही बनता है.

इनकी दिलकशी के कारण कई लोगों ने अब इसे पेइंग गेस्ट के रूप में भी विकसित कर दिया है. उसके बाद यहां कलोनियल यानि ब्रितानी आर्किटेक्चर में बने गिरजाघरों को भी देखा जा सकता है. इन सबसे अलग अगर लोगों को यहां के एथनिक और ट्राइबल संस्कृति के बारे में जानना है तो यहां के दूर दराज के गांवों में जाना होगा.

अरम्बोल में मिट्टी से नहाए

गोवा में एक स्थान ऐसा भी जहां लोग मिट्टी से नहाने जाते हैं. माना जाता है कि यहां मिट्टी से नहाने से स्किन अच्छी हो जाती है. मीठे पानी की झीलों के किनारे लोग मिट्टी से नहाते हैं और बाद में आसपास में बहते झरने में नहा सकते हैं. यह स्थान हिप्पियों और युवा के बीच काफी मशहूर है.

भूतों का उत्सव देखना दिलचस्प

गोवा में भूतों का उत्सव भी मनाया जाता है. शिगमों वसंत उत्सव में लोग भूतों का धन्यवाद करते हैं. कोंकणी क्षेत्र में हिन्दू कैलेंडर के फाल्गुन महीने की पूर्णिमा की रात के आसपास मनाया जाता है. इसके साथ गदयाची जात्रा निकाली जाती है. गोवा के साल, बिचोलिम, पिलगाओ, कुड़ने, सवाई वेरम गांव के लोग अपने गांव के रक्षक देवता के रूप भूतों की पूजा करते हैं.

भीमबेटका के समकालीन सभ्यता का मिलते हैं साक्ष्य

गोवा में पुरात्तव महत्व के स्थल ज्यादा नहीं है लेकिन यहां भीमबेटका के समकालीन सभ्यता के साक्ष्य भी माजूद है. 6000-8000 साल पुरानी सभ्यता के साक्ष्य कुशावती नदी के किनारे मिलते हैं. शिलालेख भी देखे जा सकते हैं जिसमें पशु और पक्षियों के चित्र अंकित हैं. दक्षिण गोवा के आंतरिक इलाकों में जैव विविधता को भी करीब से देखा व महसूस किया जा सकता है. यहां चिड़ियों को देखने का फेस्टिवल भी आयोजित होता है. करीब 450 प्रजाति के अलग अलग तरह के पक्षी देखे जा सकते हैं.

मंगेश मंदिरों के साथ कई प्राचीन मंदिरों के कर सकते हैं दर्शन

गोवा में चर्च के साथ प्राचीन मंदिरों के दर्शन करना भी अद्भुत है. खासकर गणेश उत्सव के आसपास के समय में यहां की रंगत अलग ही होती है. श्री मंगेश संस्थान, श्री शांतादुर्गा, प्राचीन सोमेश्वर मंदिर देखे जा सकते हैं. इनमें से मंगेश संस्थान मंदिर लता मंगेशकर के गांव मंगेशी में है. गोवा की राजधानी पणजी से 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस मंगेशी मंदिर भगवान शिव का मंदिर है.

इन मंदिरों में चढ़ाए जाने वाले सूखी बूंदी के लड्डू का स्वाद भी सबसे अलग है. इन मंदिरों के बाहर की दुकानों में प्रसाद के साथ शिवलिंग खरीदें जा सकते हैं. इसके साथ यहां से कोकम की खरीदारी भी की जा सकती है. इसके साथ गोवा में रणमाल्य यानिरामलीला भी खेली जाती है. अलग भाषा में रामलीला देखने का अनुभव रमणिय होता है.

मगरमच्छ की मटरगश्ती के बने गवाह

गोवा की संस्कृति में मगरमच्छों का भी महत्व है. यहां के किसान मगरमच्छों का उत्सव भी मनाते हैं. इसके साथ कम्बर्जुआ नहर के किनारे मगरमच्छ सफारी का भी आनंद उठा सकते हैं. मैंग्रूव की कतारों की सुंदरता से यह स्थान और भी निखर जाता है. हालांकि बरसात में यह जगह खतरनाक हो जाती है. इसलिए यहां आने का सही समय नवंबर से मई तक है.

चावल की चक्की को चलाए, कोंकणी गीतों का ले लुत्फ शहर को करीब से देखने के लिए वहां की संस्कृति के करीब जरूर जाएं. गोवा में शॉपिंग, पब बार के साथ कुछ कस्बों के घरों में चावल की चक्की चलाई जाती है. विदेशी सैलानी खासतौर पर इसे देखने और इसे चलाने का अनुभव लेने के लिए जाते हैं. इस चक्की को चलाते वक्त गाए जाने वाले मधुर लोकगीतों का भी लुत्फ लिया जा सकता है.  

हिन्दुस्थान समाचार/विजयलक्ष्मी

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