पर्रिकर के बाद गोवा

संजय वर्मा

गोवा में राजनीतिक उथल-पुथल का जो दौर चल रहा है उसकी समाप्ति के आसार फिलहाल तो दूर-दूर तक नजर नहीं आते. वही विधायक, वही राजनीतिक दल, वही महत्वाकांक्षाओं का टकराव.

बस नहीं हैं तो प्रदेश की राजनीति को अपने कुशल नेतृत्व में संभालकर रखने वाले दिवंगत नेता मनोहर पर्रिकर. किसी को भी यह महसूस हो सकता है कि जीवित रहते मनोहर पर्रिकर क्या थे और अब जब वे नहीं हैं तब कितना कठिन हो गया है इस छोटे से प्रदेश को मैनेज करना.

17 मार्च को कैंसर की जानलेवा बीमारी से जूझ रहे मनोहर पर्रिकर ने अंतिम सांस ली. हालांकि, उनके जाने के बाद भी प्रदेश में भाजपा की ही सरकार है और प्रमोद सावंत उसके मुख्यमंत्री के तौर पर सत्तासीन हैं.

उन्हें विधान सभा में बहुमत भी हासिल हो चुका है, लेकिन फिर भी अस्थिरता का जो आलम है वह बता रहा है कि गोवा और विशेष तौर पर भाजपा के लिए मनोहर पर्रिकर की क्या अहमियत थी.

मनोहर पर्रिकर की अहमियत का एहसास भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को उसी दिन हो गया था जब पर्रिकर के निधन के बाद गोवा में सरकार बचाए रखने के प्रयास आरंभ हुए थे. 

सरकार बचाए रखने के क्रम में भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और वर्तमान अध्यक्ष अमित शाह को अपना संपूर्ण राजनीतिक कौशल झोंक देना पड़ा था, तब जाकर प्रमोद सावंत गोवा के अगले मुख्यमंत्री के तौर पर 19 मार्च को देर रात शपथ ले पाए थे.

गोवा की राजनीति के जानकार यह मानते हैं कि अगर उस रात प्रमोद सावंत शपथ नहीं लेते तो सुबह होने के बाद बहुत देर हो जाती और भाजपा के सहयोगी दलों में से एक विधायक के समर्थन के साथ विपक्ष का मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहा होता. 

नितिन गडकरी और अमित शाह जैसे रणनीतिकारों को गोवा में सब कुछ मैनेज करने के लिए लगभग दो दिन तक जितनी मेहनत करनी पड़ी उसी से जाहिर है कि इस छोटे से प्रदेश में बहुमत न होने की स्थिति में सरकार चलाना कितना कठिन है. मनोहर पर्रिकर इस कठिन काम को बखूबी अंजाम दे रहे थे.

पढ़े पूरा लेख युगवार्ता के 07 अप्रैल के अंक में… 

%d bloggers like this: