बनते बापू, रंगते बापू…

देव प्रकाश चौधरी

बापू को उन्होंने आवाज नहीं दी थी, फिर भी वे आए. शुरूआत मानवता का संदेश देने के लिए स्ट्रीट वॉल पर कुछ चित्रों से हुई थी. कुछ ही दिनों में क्रिप्टिक की कला में बापू नजर आने लगे.

क्रिप्टिक ने बापू को कभी देखा नहीं, लेकिन लॉस एंजिल्स के यह स्ट्रीट चित्रकार सड़कों पर बापू के साथ नजर आया. लोगों ने पूछा तो बहुत कम बोलने वाले और अपनी पहचान को लेकर बेहद संकोची क्रिप्टिक ने दार्शनिक अंदाज में इतना भर कहा, “बात मानवता की होगी तो बापू को आना ही होगा.”

बापू को उन्होंने आवाज नहीं दी थी, फिर भी वे आए. शुरुआत मानवता का संदेश देने के लिए स्ट्रीट वॉल पर कुछ चित्रों से हुई थी और कुछ ही दिनों में क्रिप्टिक की कला में बापू नजर आने लगे.

क्रिप्टिक ने बापू को कभी देखा नहीं, लेकिन लॉस एंजिल्स के यह स्ट्रीट चित्रकार सड़कों पर बापू के साथ नजर आया. लोगों ने पूछा तो बहुत कम बोलने वाले और अपनी पहचान को लेकर बेहद संकोची क्रिप्टिक ने दार्शनिक अंदाज में इतना भर कहा, “बात मानवता की होगी तो बापू को आना ही होगा.”

एक सामान्य भारतीय जिंदगी में महात्मा गांधी कब आते हैं और कब चले जाते हैं, इसका हिसाब तो मुश्किल है, लेकिन एक बात तो स्वीकार्य ही है कि गांधी आते हैं. कभी चुपके से तो कभी आवाज लगाते हुए.

कभी “नहीं” के अंधेरे में तो कभी ह्यहांह्ण के उजाले में. गांधी के आने के लिए हर “हां” के पीछे नहीं का अंधेरा होता है तो हर “नहीं” के पीछे “हां” का अपना प्रकाश भी होता है. “हां” और “नहीं” के विश्वास और संदेह के इस चक्र के बावजूद गांधी आते हैं.

हमसे पहले की पीढ़ी के पास भी और आज की पीढ़ी के बीच भी. एक निर्भय भारतीयता का बोध कराने के लिए वे आते हैं, बावजूद इसके कि हममें से बहुतों की जिंदगी में भारतीयता एक केंद्रीय प्रश्न के रूप में नहीं है, फिर भी हम यह मानते ही रहे हैं कि एक गांधी दृष्टि थी.

जिससे कभी हम अपने समय के विखंडन और टूट के सबसे भयानक दौर से उबरकर स्वाभिमान के मंच पर खड़े हुए थे. यहीं से भारतीयता का प्रश्न हमारे समकालीन सृजन और विचार का प्रश्न भी बना था. हालांकि, हमारी परंपरा में भारतीयता को लेकर हमारे विचार बहुत सहज रहे. और हम मानते थे कि यह हमारे उत्तराधिकार का सवाल है.

पूरा लेख पढ़ें नवोत्थान के अक्टूबर अंक में…

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