गांधी दे गये स्वच्छता का मंत्र

डॉ. प्रभात ओझा

तथ्य मिलते हैं कि गांधी जी ने दक्षिण अफ्रीका के ट्रांसवाल में भारतीय समुदाय पर स्वच्छता के प्रति लापरवाही के आरोप का जोरदार खंडन किया था. साथ ही एक सच्चाई और भी है.

उन्होंने वहां के व्यापारियों के कार्यस्थल पर सफाई की वकालत की, तो दूसरी ओर मजदूर बस्तियों में स्वच्छता के अभियान चलाये. फिर 1915 में हरिद्वार कुंभ के दौरान उनके नेतृत्व में चला सफाई अभियान सर्वविदित है.

हरिद्वार से भी पहले गांधीजी गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के शांति निकेतन पहुंचते हैं. वहां अपने तीन दिन के पहले संक्षिप्त प्रवास में उन्होंने स्वच्छता के लिए विशेष पहल की. आचार्य कृपलानी इसका रोचक ढंग से वर्णन करते हैं.

उनके मुताबिक स्वयं गुरुदेव की अभिजात्य दिनचर्या भी आश्रम की साफ-सफाई के प्रति उदासीन बनी हुई थी. गांधी जी ने अपने साथ आये फिनिक्स सदस्यों और आश्रमवासियों की मदद से शांति निकेतन परिसर को न केवल साफ-सुथरा बनाया, वरन गुरुदेव और छात्रों को अपना कार्य स्वयं करने का संकल्प कराया. इसमें खाना बनाना भी शामिल था.

इन तथ्यों से भ्रम नहीं होना चाहिए कि ट्रांसवाल ही बापू के स्वच्छता के प्रति आग्रह का प्रथम स्थान है. बालक मोहनदास ने तो अपने घर में ही पखाना साफ करने के लिए उका नाम के बच्चे के आने को गौर किया था.

उन्हें लगा कि उका ही दूसरों की गंदगी क्यों उठाता है. हर व्यक्ति अपनी गंदगी क्यों नहीं साफ कर सकता. फिर युवक मोहदनदास करमचंद गांधी का राजकोट में 1886 में सफाई वाली टीम में शामिल होना एक और बिंदु की ओर ध्यान दिलाता है.

बिंदु यह कि, उनके चरित्र में सफाई के लिए समर्पण दक्षिण अफ्रीका से स्वदेश लौटने पर नहीं, उसके पहले दक्षिण अफ्रीका में निवास के समय भी नहीं, बल्कि बहुत पहले शामिल हो चुका था.

महात्मा गांधी ने स्वच्छता को किस कदर गम्भीरता से लिया, उनके बार बार लिखने और जहां भी गये, इस ओर ध्यान खींचने में दिखाई देता है.

पूरा लेख पढ़ें युगवार्ता के 16-30 अप्रैल के अंक में…

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