अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता या चरित्र हनन की छूट

आर.के. सिन्हा

क्या भारत में पत्रकारों और शेष नागरिकों के लिए अलग-अलग कानून हैं? नहीं न. 

यह सवाल अब इसलिए अहम हो चुका है कि अपने को स्वतंत्र पत्रकार कहने वाले प्रशांत कनौजिया की गिरफ्तारी के बाद कुछ पत्रकारों और वरिष्ठ पत्रकारों की संस्था एडिटर्स गिल्ड उसकी (प्रशांत कनौजिया) गिरफ्तारी पर विरोध जता रहे थे. 

हालांकि माननीय उच्चतम न्यायालय ने प्रशांत कनौजिया की रिहाई के आदेश दे दिए हैं, पर यह सवाल तो अपनी जगह पर बना ही हुआ है क्या पत्रकारों पर देश का कानून लागू नहीं होता?

उत्तर प्रदेश के निर्वाचित और लोकप्रिय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर सोशल मीडिया पर पोस्ट लिखने वाले पत्रकार प्रशांत कनौजिया की गिरफ्तारी को लेकर उच्चतम न्यायालय ने कड़ी टिप्पणी की है. 

कोर्ट ने कहा है कि एक नागरिक के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता है, उसे बचाए रखना जरूरी है. ये बेहद अहम टिप्पणी है. लेकिन, फिर यह सबपर लागू होनी चाहिये. 

माननीय निर्वाचित जनप्रतिनिधियों पर भी और एक ऐसी प्रक्रिया के तहत न्यायधीश बनाये जाने वाले न्यायधीशों पर भी जिनकी नियुक्ति प्रक्रिया की पारदर्शिता पर अनेकों सवाल उठाते रहे हैं! 

राजधानी में विगत सोमवार को पत्रकारों ने कनौजिया की गिरफ्तारी के विरोध में प्रेस क्लब के बाहर प्रदर्शन भी किया. हालांकि कनौजिया के हक में खड़े होने के सवाल पर पत्रकार बिरादरी भी बुरी तरह बंटी नजर आई. 

दिल्ली प्रेस क्लब के एक आला पदाधिकारी ने कहा कि प्रेस क्लब को कनौजिया के हक में सामने नहीं आना चाहिए था. बहरहाल, कुछ पत्रकारों ने  प्रदर्शन में कनौजिया की गिरफ्तारी को अभिव्यक्ति की आजादी पर कुठाराघात के रूप में बताया. 

क्या इसी संदर्भ में यह नहीं पूछा जाना चाहिए कि कनौजिया के ट्वीट के कारण उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रतिष्ठा पर जो हमला हुआ है, क्या वह उनको संवैधानिक अधिकार को भंग करने की गन्दी कोशिश नहीं है? क्या वे अपने बचाव में कोई कार्रवाई नहीं कर सकते?

पूरा लेख पढ़ें युगवार्ता के 23 जून के अंक में…

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