अब इन फसलों की खेती से किसानों के आएंगे अच्छे दिन

  • सतावर उत्पादक किसान विमलेश कुमार चौधरी ने सतावर की कृषि तकनीक उत्पादन प्रसंस्करण और मार्केटिंग की जानकारी दी
  • सतावर की खेती से होने वाली आकर्षक आमदनी से किसानों की आर्थिक हालत मजबूत होगी

बेगूसराय, 11 जुलाई. बेगूसराय में औषधियों खेती की ओर काफी संख्या में किसान जागरूक होने लगे हैं तथा सतावर, मूसली, तुलसी आदि की खेती हो रही है. इसी कड़ी में छौड़ाही प्रखंड के सिहमा में प्रखंड स्तरीय अमृत वनौषधि उत्पादक कृषक हित समूह का गठन किया गया.

15 सदस्यीय समूह में सर्वसम्मति से कुंदन कुमार चौधरी को अध्यक्ष, धर्मेंद्र प्रसाद सिंह को सचिव एवं रामविनोद राय को कोषाध्यक्ष बनाया गया है. समूह के सभी सदस्यों ने चार-चार एकड़ में पीला सतावर लगाने का फैसला किया है.

सतावर उत्पादक किसान विमलेश कुमार चौधरी ने सतावर की कृषि तकनीक उत्पादन प्रसंस्करण और मार्केटिंग की जानकारी दी. उन्होंने बताया कि सतावर से प्रति एकड़ दो साल में छह-सात लाख तक कि आय ली जा सकती है.

अग्रणी किसान सह किसान सलाहकार अनीश कुमार ने बताया कि सतावर का उपयोग विभिन्न रोगों को दूर करने में भारत के लोग प्राचीनकाल से करते आ रहे हैं. पहले इसे जंगलों से उखाड़ कर उपयोग में लाया जाता था, खेती नहीं होती थी. लेकिन सतावर की दवा निर्माण में बढ़ती हुई मांग तथा निर्यात ने इसकी व्यावसायिक खेती करने के लिए किसानों को प्रेरित किया है.

सतावर की खेती से होने वाली आकर्षक आमदनी से किसानों की आर्थिक हालत मजबूत होगी. उन्होंने बताया कि औषधीय पौधों की दहलीज को अब पार कर सतावर ने औषधीय फसल का दर्जा प्राप्त कर लिया है. औषधीय फसलों में सतावर अद्भुत गुणों वाली एक फसल है जिसे बिना सिंचाई के उगाया जाता है.

यह जमीन से प्राप्त पानी से ही काम चला लेता है जिससे इसे कृषि जल संरक्षण का अभियान भी माना जाता है. सतावर की फसल में सूखा को सहन करने की अपार शक्ति होती है. सतावर के बीज का अंकुरण करीब 60-70 प्रतिशत होता है, जिससे प्रति हेक्टेयर 12 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है.

पौधशाला तैयार करने के लिए एक मीटर चौड़ी तथा दस मीटर लम्बी क्यारी बनाएं तथा उसमें से कंकड़-पत्थर निकाल दें. पौधशाला की एक भाग मिट्टी में तीन भाग गोबर की सड़ी खाद मिला देनी चाहिए. बीजों को नर्सरी क्यारी में 15 सेमी की गहराई में बो कर ऊपर से हल्की मिट्टी से ढंक देनी चाहिए. बुवाई के तुरंत बाद सिंचाई करना आवश्यक होता है.

लगभग एक माह में बीजों का अंकुरण हो जाता है तथा दो महीने बाद पौधे रोपाई के लायक हो जाते हैं. व्यावसायिक खेती के लिए सतावर के ऐसे पौधों को चुनना चाहिए, जिनमें छोटी-छोटी जड़ें दिखती हों. साधारणतया अगस्त में जब पौधे 10-15 सेंमी ऊंचाई के हो जाते हैं तब उनको तैयार भूमि में 60 सेमी. की दूरी पर बनी दस सेमी. गहरी नालियों में रोप दिया जाता है.

पौध से पौध की दूरी 60 सेंमी रखी जाती है. इसके अलावा फसल की खुदाई के समय भूमिगत जड़ों के साथ कभी-कभी छोटे-छोटे अंकुर प्राप्त होते हैं जिससे पुनः पौधा तैयार किया जा सकता है. कार्यक्रम के मुख्य अतिथि भोपाल से आये डॉ पीसी पाठक ने सतावर की खेती और प्रसंस्करण पर विस्तार से चर्चा की.

उन्होंने चंदन की खेती पर अपना विस्तृत अनुभव किसानों से साझा करते हुए बताया कि एक किलो चंदन की लकड़ी की कीमत वर्तमान बाजार में आठ से दस हजार रुपये है. एक एकड़ में चंदन का करीब ढ़ाई सौ पेड़ लगेगा. एक पेड़ की कीमत यदि वर्तमान दर से एक लाख रुपए मानी जाए तो केवल डेढ़ सौ पेड़ से 20 वर्ष में 15 करोड़ रुपए प्राप्त होंगे.

सुधीर प्रसाद ने मानव स्वास्थ्य में वनौषधियों के महत्व पर चर्चा की जबकि समस्तीपुर वनौषधि उत्पादक समूह के अध्यक्ष संजय कुमार ने समूह के महत्व एवं सरकार की समूह के प्रति लाभकारी योजनाओं की चर्चा की.

मौके पर हरिशंकर यादव, अरुण चौधरी, रजनीकांत महतो, कृष्ण कुमार सिंह एवं चंदन कुमार आदि ने भी अपना विचार रखा. हिन्दुस्थान समाचार/सुरेन्द्र

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