श्रीलक्ष्मी नारायण मंदिर…जहां होते हैं हरि के दर्शन..

विजय कुमार राय

राजधानी दिल्ली का सुपरिचित रास्ता है- मंदिर मार्ग. इसके बीचों-बीच लक्ष्मी नारायण मंदिर है. बोलचाल में यह बिड़ला मंदिर है. भगवान श्रीहरि विष्णु के इस मंदिर को लेकर कई दंत कथाएं हैं.

उससे ही इस मंदिर की प्राचीनता का अंदाजा होता है. रामकृष्ण आश्रम मेट्रो स्टेशन से यहां तक पैदल पहुंचा जा सकता है. मंदिर मार्ग पर ही मेरी भेंट एक श्रद्धालु से हुई.

वे बोले- ह्यभगवान विष्णु सृष्टि के पालनहार हैं. उनकी मर्जी के बिना मनुष्य दो कदम भी नहीं चल सकता है. बातचीत करते हुए हमलोग पैदल मंदिर परिसर के नजदीक पहुंच चुके थे. वहां पहुंचकर सुखद अनुभूति हुई.

दिन गुरुवार का था, जिसका एक विशेष महत्व था. तभी साथ चल रहे श्रद्धालु ने कहा- ह्यजो नर नारायण पर भरोसा करता है, उसे अपने जीवन में कभी कोई परेशानी नहीं होती है.

इसकी दूरी करीब डेढ़-दो किलोमीटर है. मंदिर के पीछे अरावली पहाड़ी की हरियाली दूर तक फैली हुई है. करीब 7.5 एकड़ क्षेत्र में फैले मंदिर के परिसर का दृश्य मनोरम है.

मंदिर के प्रांगण में प्रवेश करते ही वह अपनी प्राचीनता का प्रत्यक्ष अनुभव कराती है. यहां का
वातावरण हमें भारतीय संस्कृति के भाव से सराबोर कर देता है.

यहां सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालु प्रतिदिन अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए आते हैं. ऐसी मान्यता है कि जो कोई सच्चे मन से श्रीहरि नारायण से प्रार्थना करता है, भगवान श्रीहरि उनकी मनोकामना जरूर पूरी करते हैं.

मंदिर के दरवाजे मनुष्य मात्र के लिए हमेशा खुले रहते हैं. यहां भक्तों के बीच कोई भेद नहीं है. सभी समान हैं. मंदिर के मुख्य भाग में भगवान नारायण और माता लक्ष्मी की मूर्ति विराजमान है.

इसके अलावा मंदिर परिसर में सनातन धर्म से जुड़े कई देवी देवताओं की मूर्तियां स्थापित हैं. इस मंदिर में बारहों मास विदेशी सैलानियों का आना-जाना लगा रहता है, लेकिन, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, दीपावली और गोवर्धन पूजा के अवसर पर यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुटती है.

उस अवसर पर मंदिर की भव्यता देखते बनती है. मंदिर का इतिहास लक्ष्मी नारायण मंदिर का इतिहास काफी पुराना है. कुछ लोग यहां तक दावा करते हैं कि 1622 ईस्वी में वीर सिंह देव ने इस मंदिर का निर्माण कराया था.

उसके बाद 1793 ईस्वी में पृथ्वी सिंह ने इसका जीर्णोद्धार कराया. लेकिन, जो भव्य मंदिर आज हमें दिखाई दे रहा है, उसकी आधारशिला महाराज उदयभान सिंह ने 26 मार्च, 1933 को रखी थी.

मंदिर के निर्माण के दौरान पंडित विश्वनाथ शास्त्री के मार्गदर्शक में 101 पंडितों ने मूर्तियों की विधिवत स्थापना की. मंदिर के मौजूदा स्वरूप के निर्माण का श्रेय देश के जानेमाने उद्योगपति परिवार बिड़ला समूह को जाता है.

यह वही परिवार है, जिसने देश के औद्योगिक विकास में अहम भूमिका निभाई है. 1933 ईस्वी में
बीडी बिड़ला ने अपने बेटे जुगल किशोर बिड़ला के साथ मिलकर इस मंदिर का निर्माण शुरू किया था.

करीब छह साल के अथक परिश्रम के बाद इस मंदिर को एक नया स्वरूप दिया गया. अथक परिश्रम के बाद मंदिर का निर्माण कार्य 13 मार्च, 1939 को संपन्न हुआ, जिसके बाद स्वामी केशव नंदजी की अध्यक्षता में एक यज्ञ का आयोजन किया गया.

इस अवसर पर महात्मा गांधी स्वयं यहां उपस्थित थे. यह वो दौर था, जब औपनिवेशिक काल के प्रभाव में आकर भारतीय समाज में भेदभाव और छुआछूत जैसी भावना घर कर चुकी थीं.

गांधीजी स्वतंत्रता की लड़ाई के साथ-साथ समाज में व्याप्त इन विसंगतियों को दूर करने के लिए भी संघर्ष कर रहे थे. गांधीजी के सुझाव पर ही बिड़ला परिवार ने इस बात को सहर्ष स्वीकार किया.

यह निर्णय लिया गया कि इस मंदिर में आने वाले भक्तों के साथ उनकी जाति और धर्म के नाम पर
कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा.

सभी जातियों के भक्तों को मंदिर में प्रार्थना करने की अनुमति दी गई. यह बात सिर्फ मौखिक रूप में नहीं है, बल्कि मंदिर परिसर में स्थित एक स्तंभ पर लिखित रूप में मौजूद है.

मंदिर की अतुल्य भव्यता उत्तर भारत में यह मंदिर नागर शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है. मंदिर के मौजूदा स्वरूप को आकार देने का श्रेय सरिस चंद्र चटर्जी को जाता है.

चटर्जी की पहचान आधुनिक वास्तुकार की थी. मंदिर निर्माण के दौरान धार्मिक और राष्ट्रीय महत्व को ध्यान में रखते हुए उन्होंने आधुनिक तकनीक और सामग्रियों का उपयोग किया.

लाल पत्थर और संगमरमर से बने इस मंदिर का सबसे बड़ा आकर्षण 160 फीट ऊंचा इसका शिखर है, जो गर्भगृह के ठीक ऊपर है. सूर्योदय के समय आश्चर्यजनक रूप से सुंदर दिखने वाला यह शिखर हर किसी को आकर्षित करता है.

मुख्य मंदिर में भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी का निवास है. यह मुख्य द्वार से सुरक्षा जांच के बाद सीढ़यिों से ऊपर चढ़ने पर सामने दिखाई देता है.

कमल पर विराजमान भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की मूर्ति की सुंदरता का शब्दों में वर्णन करना असंभव बात है. यहां बने हाथी और स्वस्तिक के निशान भक्तों का ध्यान खींचने का काम करते हैं.

सनातन धर्म में हाथी और स्वस्तिक को शुभ माना जाता है. बाल गोपाल, शालीग्राम, ज्ञान की देवी माता सरस्वती और नारदजी की मूर्तियां पूरे वातावरण को भक्तिमय बनाने का काम करती हैं.

लाल पत्थर और संगमरमर से बने इस मंदिर का सबसे बड़ा आकर्षण 160 फीट ऊंचा इसका शिखर है, जो गर्भगृह के ठीक ऊपर है. सूर्योदय के समय आश्चर्यजनक रूप से सुंदर दिखने वाला यह शिखर हर किसी को आकर्षित करता है.

यहां श्रीविष्णु और देवी लक्ष्मी के मुख्य मंदिर और सीढ़ियों के बीच एक लंबा-चौड़ा स्थान है. वह सफेद संगमरमर से बना है, जो आमतौर पर आरती के समय श्रद्धालुओं से भर जाता है.

मुख्य मंदिर के चारों ओर घूमने समय दीवारों पर कपिल मुनि, ऋषभ देव, व्यासजी, सुखदेवजी, छत्रपति शिवाजी और गुरु गोविंद सिंहजी की छवि दिखाई देती है.

इन छवियों को अत्यंत कलात्मक ढंग से बनाया गया है, जो देखने में अत्यंत मनोरम लगता है. पास में ही एक ह्यओम ग्लोबह्ण और बड़ा सा घंटा रखा है.

ओम ग्लोब का अर्थ है- ह्यपूरा ब्रह्मांड ओम के अंदर समाहित है.ह्ण घंटा के बारे में पूछने पर मंदिर के पुजारी शिवलाल त्रिपाठी कहते हैं- ह्यभगवान नारायण को चीन के बौद्ध भिक्षुओं ने यह भेंट स्वरूप दिया था.

थोड़ी दूरी पर माता दूर्गा का मंदिर है, जहां भैरव बाबा और योगिनी को लाइट के माध्यम से चित्रित किया गया है. मंदिर परिसर में मर्हिष पतंजलि, संत कबीरदास, संत रविदास, जोगमाया और धनवंतरी जी के चित्र देखने को मिलते हैं.

ध्यान मुद्रा में भगवान शिव के दर्शन के अलावा गणेशजी और रामजी के दर्शन का सौभाग्य भी इस
मंदिर में आने पर प्राप्त होता है.

भगवान श्रीगणेश के ठीक सामने एक छोटे मंदिर में वेदों को रखा गया है, जिसके करीब नौ ग्रहों को देखा जा सकता है. मुख्य मंदिर से उत्तर-पूर्व में गीता मंदिर स्थित है, जिसके केंद्र में भगवान श्रीकृष्ण सुदर्शन चक्र लिए नजर आते हैं.

गीता मंदिर का पूरा हॉल चित्रकारी से सजा हुआ है. पास ही में श्रीकृष्ण की मूर्ति को दर्पण में इस तरह से सजाया गया है कि वहां जाने पर चारों ओर भगवान श्रीकृष्ण का असंख्य रूप एकबारगी प्रकट हो जाता है.

मंदिर के पूर्व दिशा में हनुमानजी की प्रतिमा को स्थापित किया गया है. मुख्य मंदिर से लेकर गीता मंदिर तक ओम, श्रीविष्णु सहस्त्रनामावली और गीता के श्लोकों का पाठ लगातार चलता रहता है, जो पूरे मंदिर परिसर के वातावरण को भक्ति-रस में घोल देता है.

मंदिर के पीछे एक बड़ा बाग है, जहां मंदिर के संस्थापक जुगल किशोर बिड़ला जी की प्रतिमा लगाई गई है. वहीं पास में गीता-रथ और यज्ञशाला भी है. यज्ञशाला की दीवार पर वेदों की ऋचाएं और साधु-सतों के अनमोल वचन लिखे हुए हैं.

इसी बाग में यज्ञशाला से कुछ दूरी पर आंवले का एक पेड़ है, जहां कार्तिक मास में श्रद्धालु पूजा-पाठ करते हैं. बाग के अंतिम छोर पर एक विशाल दक्षिण भारतीय प्राचीन मंदिर है, जिसके बारे में दावा किया जाता है कि वह आठवीं सदी का है.

इसी तरह के विष्णु मंदिर का निर्माण महाराज कीर्ति वर्मण के काल में जावा और यवदीप में करवाया था, जो प्राचीन भारतीय सभ्यता के गौरव का उत्कृष्ट नमूना है.

इसके अतिरिक्त बाग में एक पंचमुखी शिव का मंदिर है, जिसमें श्रीगणेश और पार्वती की प्रतिमा विराजमान है. मंदिर के साथ विकसित हुआ विशाल उद्यान बच्चों की उत्सुकता को अत्यधिक बढ़ाने वाला स्थल है.

यहां बने पानी के फब्बारे, चीता, भालू, गेंडा, मगरमच्छ, ऊंट तथा अन्य जीव-जन्तुओं की आकृतियां बच्चों के मान को मोहित करती हैं. मंदिर के इस उद्यान में एक कृत्रिम गुफा भी देखी जा सकती है.

गुफा के पास एक पंचमुखि शिव मंदिर की स्थापना भी की गई है. मंदिर परिसर में ही एक विशेष स्थल का निर्माण किया गया है, जहां लोग शादी-विवाह के लिए लड़के और लड़कियां को एक दूसरे से परिचय कराने का काम होता है.

ऐसी मान्यता है कि इस मंदिर परिसर में सगाई करने वालों का वैवाहिक जीवन खुशहाल रहता है. पंडित शिवकुमार त्रिपाठी तो यहां तक कहते हैं कि मंदिर में 40 दिन तक लगातार आने और लक्ष्मी नारायण के दर्शन करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है.

इस मंदिर के जुड़ी एक अन्य मान्यता के बारे में प्रबंधक विनोद कुमार मिश्र ने कहा कि इस मंदिर में आने और प्रार्थना करने से घर के वास्तुदोष का निवारण भी होता है.

यहां सुबह साढ़े चार बजे पहली आरती होती है. इसके साथ मंदिर के पट को आम लोगों के लिए खोल दिया जाता है. यह मान्यता है कि इस आरती से प्रभु नींद से उठ जाते हैं.

इसके बाद साढ़े पांच बजे मंगला आरती का आयोजन किया जाता है. शाम को साढ़े छह से सात के बीच संध्या आरती होती है. रात के नौ बजे की आरती के बाद मंदिर का पट श्रद्धालुओं के लिए बंद कर दिया जाता है.

दिन में डेढ़ से ढाई बजे के बीच एक घंटे के लिए मंदिर में विश्राम का समय होता है. मंदिर में ही साधु-संतों के साथ-साथ आम श्रद्धालुओं के लिए एक विशाल धर्मशाला बना है.

दूर-दूर से आने वाले श्रद्धालु यहां विश्राम करते हैं. देशाटन के लिए निकले संन्यासी भी यहां ठहरते हैं और आगे बढ़ जाते हैं. दरअसल, मंदिर का आध्यात्मिक वातावरण उन्हें अपनी तरफ आकर्षित करता रहता है.

साभार – नवोत्थान

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