कथा मंजूषा कला की, कला में आ रहा परिवर्तन-बदलाव…

कुमार कृष्णन

लोककला समाज की प्रचलित आस्थाओं, विश्वासों, धारणाओं, मान्यताओं, जनआकांक्षाओं और सांस्कृतिक भावनाओं को अभिव्यंजित करती है.

इतिहास इस बात का प्रमाण प्रस्तुत करता है कि मोहनजोदड़ो ओर हड़प्पा संस्कृति से लेकर समकालीन संस्कृति तक समाजिक परिवर्तन के साथ लोककला में परिवर्तन आया है.

जोकि लोककला जनसाधारण की भावनाओं एवं संस्कारों से संयुक्त होती है, इसलिए सामाजिक बदलाव साथ में विकास और बदलाव लाती है.

जाहिर है कि इसी वजह से लोककला सुरक्षित रह पाई है. भारत का एक-एक कोना संगीत, चित्र, मूर्ति एवं स्थापत्य कला के बेजोड़ नमूनों से अटा पड़ा है.

वैसे तो लोककला के क्षेत्र यथा लोकसंगीत, लोकनृत्य आदि पर किंचित काम हुए हैं, किन्तु चित्रकला पर अभी काम होना बांकी है.

सच तो यह है कि क्लासिक चित्रकला का आधार लोक चित्रकला ही है. फिर भी लोक चित्रकला उपेक्षित रही है. इस बात के ऐतिहासिक प्रमाण हैं कि शास्त्रीय चित्रकला राज्याश्रित होने के कारण एकरस होने लगी थी, किंतु लोक चित्रकला में कल्पना और भावना की ताजगी बनी रही.

इतना ही नहीं, बल्कि तमाम बाधाओं के बावजूद लोक चित्रकला अपनी स्वस्थ परंपरा को जीवित रखने में कामयाब रही है.

दरअसल, लोक चित्रकला में अभिव्यक्ति की तरलता और भावनाओं की बारीकी होती है, जबकि क्लासिक चित्रकला में बौद्धिकता और तकनीकी उफान का स्वर प्रमुख होता है.

चूंकि लोक चित्रकला में परंपरा का सकारात्मक विकास स्वत:स्फूर्त रूप से होता है, इसलिए यह बेहद जरूरी है कि लोक चित्रकला की सृजनशीलता को उपभोक्तावादी उत्पादनशीलता की कीमत पर नष्ट होने से बजाया जाए.

आमतौर पर लोक चित्रकला में पशु-पक्षी, मंगल-संकेत, देवी-देवताओं, पौराणिक गाथाओं एवं लोक गाथाओं का ?चित्रण किया जाता है. पूरे देश में इस तरह के लोकचित्र बिखरे पड़े हैं.

महाराष्ट्र की “रंगोली” हो या गुजरात की “कलोटी” या बिहार की “मधुबनी चित्रकला” सबमें लोक चित्रकला की विशेषताएं देखी जा सकती है. इन लोक चित्रों की रेखाओं में भावनाओं को प्रधानता दी जाती हैं.

इनकी रेखाएं बारीक और स्पष्ट खींची जाती हैं. इनके रंग और रेखाएं मौलिकता लिए होती है. पृष्ठभूमि के आधार पर ही चित्रों में रंगों का प्रयोग निर्भर करता है.

पूरा लेख पढ़ें नवोत्थान के सितंबर अंक में…

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