उत्तर में मोदी ही मोदी

जितेन्द्र चतुर्वेदी

हर हर मोदी, घर घर मोदी 2014 के आम चुनाव में मुहावरा बन गया था. चहुंओर बस यही सुनाई देता था. तब नरेन्द्र मोदी की आंधी चल रही थी, जो इस बार चक्रवात में बदल गई. वह अपने साथ सब उड़ा ले गई. विपक्ष बस गाल बजाता रह गया.

हासिल उसे कुछ नहीं हुआ. हालांकि उसने माहौल खूब गढ़ा था. लुटियन के टीले पर बैठे हमारी बिरादरी के लोगों ने उसे खूब बढ़ाया. बाकायदा अभियान चलाया गया. सोशल मीडिया भी उनका हथियार बना.

निशाने नरेन्द्र मोदी ही थे. वे अकेले एक तरफ थे और पूरा विपक्ष दूसरी तरफ. मतलब समूचा विपक्ष यदि किसी से लड़ रहा था वे नरेन्द्र मोदी थे. हालात ये थे कि नेताओं के भाषण से लेकर पार्टी के घोषणा पत्र तक बस मोदी विरोध ही था.

हर सीट पर विपक्ष मोदी से लड़ रहा था, स्थानीय प्रत्याशी से नहीं. वह तो चुनावी परिदृश्य में कहीं था ही नहीं. जैसे बस्ती लोकसभा सीट पर जनता भाजपा प्रत्याशी से ज्यादा नरेन्द्र मोदी की बात कर रही थी.

वह स्थानीय भाजपा उम्मीदवार से बहुत ज्यादा खुश नहीं थी. मगर फिर भी वह नरेन्द्र मोदी के साथ खड़ी थी. खुद वहां के उम्मीदवार चुनावी सभाओं में अपने काम पर नहीं, नरेन्द्र मोदी के नाम पर वोट मांग रहे थे.

कारण जिस मोदी लहर को लुटियन के टीले पर बैठे लोग नकार रहे थे, उसे उम्मीदवार अपने क्षेत्र में महसूस कर रहा था. उनके आलावा जो पत्रकार क्षेत्र में घूम रहे थे, वे भी इस बात को देख रहे थे.

चुनाव के दरमियान तमाम रिपोर्ट में लिखा गया कि लोग बस मोदी को जानते हैं. वरिष्ठ पत्रकार प्रणव राय हों या फिर सागरिका घोष, सब ने माना कि चुनाव मोदी लड़ रहे हैं.

पर दिलचस्प बात देखिए कोई यह मानने के लिए तैयार नहीं था कि देश में मोदी लहर है. उसे छोड़ भी दे तो ज्यादातर लुटियन टीले के जानकार यह भी स्वीकार नहीं कर रहे थे कि गरीब-गुरवा के लिए नरेन्द्र मोदी सरकार ने कुछ किया है.

प्रणव राय ने मोहनलालगंज में सुनैना नामक 14 साल की बिटिया का जो साक्षात्कार किया है, वह इसकी मिसाल है.

पूरा लेख पढ़ें यथावत के 01-15 जून के अंक में…

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