क्यों चुनावी मुद्दा नहीं बन पाती शिक्षा?

लोकसभा चुनावों का प्रचार अब तो सारे देश में जोर पकड़ चुका है. चुनावी सभाएं, रैलियां, भाषण वगैरह हो रहे हैं. पहले चरण का चुनाव तो मंगलवार को थम भी जाएगा. हर पक्ष दूसरे पर जनता को छलने और गुमराह करने के आरोप लगा रहे हैं. ये अपनी तरफ से सत्तासीन होने पर आसमान से सितारे तोड़ कर लाने के अलावा तमाम अन्य संभव-असंभव वादे भी कर रहे हैं. पर इन सबके बीच एक मुद्दा लगभग अछूता सा बना हुआ है. वह है शिक्षा का. इतने महत्वपूर्ण बिन्दु पर अभी तक कोई सारगर्भित बहस सुनने को ही नहीं मिल रही है. देश में शिक्षा का स्तर नहीं सुधरेगा तो देश बुलंदियों को कैसे छू सकेगा. क्या ये किसी को बताने की जरूरत है?

बेशक, यह अपने आप में आश्चर्य का ही विषय है कि लोकसभा या विधान सभा चुनावों के दौरान शिक्षा के मसले पर कभी पर्याप्त बहस नहीं हो पाती. दरअसल देखा जाए तो शिक्षा को राम भरोसे छोड़ दिया गया है हमने. हमने अपने यहां स्कूली स्तर पर दो तरह की व्यवस्थाएं लागू कर रखी है. पहला प्राइवेटपब्लिक स्कूल, दूसरा, सरकारी स्कूल. पब्लिक स्कूलों में तो सब कुछ उत्तम सा मिलेगा. वहां पर बेहतर इंफ्रास्ट्रचर के साथ-साथ सुशिक्षित शिक्षक भी उपलब्ध मिलेंगे.

शिक्षकों पर नजर भी रखी जा रही है कि वे जिन विद्यार्थियों को पढ़ा रहे हैं, उन विद्यार्थियों का बोर्ड की परीक्षाओं में किस तरह का परिणाम रहता है. यदि बोर्ड की कक्षाओं को पढ़ाने वाले अध्यापकों का प्रदर्शन कमजोर रहता है तो इन कक्षाओं के शिक्षकों से सवाल भी पूछे जाते हैं. दंड तक दिया जाता है. इनकी कक्षाओं के छात्रों के बेहतरीन परिणाम आने पर इन्हें पुरस्कृत भी किया जाता है. पर ये सब जरूरी बातें लगता है कि सरकारी स्कूलों पर लागू ही नहीं होती.

वहां पर अध्यापकों की बड़ी पैमाने पर कमी होने के साथ-साथ जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर का भी नितांत अभाव है. इनमें खेलों के मैदान तक नहीं हैं.अगर हैं भी तो वे खराब स्थिति में हैं. इनमें पुस्तकालय और प्रयोगशालायें भी सांकेतिक रूप से ही चल रहे हैं.

आज़ादी के 70 साल बाद के लोकसभा चुनाव में भी शिक्षा के मुद्दे पर बहस का होना हमारी शिक्षा को लेकर पिलपिली राजनीतिक मानसिकता को ही दर्शाता है. हां, हम अपने को कहने के लिए ज्ञान की देवी मां सरस्वती का अराधक अवश्य कह देते हैं. सरस्वती पूजा के दिन पंडाल लगाकर डिस्को डांस भी करवा देते हैं.

हमारे यहां चुनावी एजेंडे के लिए पाकिस्तान, सेना, शौर्य, पराक्रम और उसके सबूत के अलावा श्मशान और क़ब्रिस्तान जैसे विषय ही काफ़ी होते हैं. आख़िर बुनियादी मुद्दों पर कोई भी पार्टी बहस क्यों नहीं करती?

बड़ा सवाल यह ही है कि सभी दल शिक्षा को लेकर अपनी भावी योजनाओं से देश के मतदाताओं को अवगत क्यों नहीं करा देते? उन्हें ये सब करने में डर क्यों लगता है? उसके बाद जनता अपना फैसला सुना दे पर अभी तक के चुनाव प्रचार के दौरान ये सब देखने को नहीं मिला.

यह विदित है कि शिक्षा के अधिकार कानून के तहत एक स्कूल में 35 बच्चों पर अध्यापक होना अनिवार्य है. पर नियमों को तो ताक पर रखा जा रहा है. कहीं-कहीं तो 220 बच्चों पर 1 शिक्षक ही तैनात है और कहीं-कहीं तो पूरा का पूरा स्कूल ही एकाध शिक्षामित्र के सहारे ही चल रहा है.

मैं राजधानी दिल्ली की स्थिति से देश को अवगत करना चाहता हूं. दिल्ली सरकार बड़े-बड़े दावे करती है कि उसने शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी कदम उठाए हैं. परन्तु उसके दावे और हकीकत में बहुत अंतर है.

दिल्ली सरकार की तरफ से यह तो बताया जाता है कि वो स्कूलों की इमारतों को सुंदर बना रही है, पर उसकी तरफ से इस तथ्य को छिपाया जाता है कि पिछले चार साल के दौरान दिल्ली के पांच लाख बच्चे सरकारी स्कूलों में फेल हुए हैं, जिनमें से चार लाख बच्चों को फिर स्कूलों ने दाखिला देने से इंकार भी कर दिया गया है. 9वीं में जो बच्चे फेल हुए, उनमें से 52 फीसदी को फिर दाखिला नहीं मिला.

क्या आप मानेंगे कि दिल्ली में 1028 स्कूलों में से 800 स्कूलों में प्रिंसिपल नहीं हैं? इनके अलावा 27 हजार से ज्यादा शिक्षकों के पद खाली पड़े हुए हैं.

अब जरा देख लीजिए कि शिक्षा को लेकर एक सरकार कितने मिथ्या दावे कर रही है. मैं यहां पर अगर दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार की कलई खोल रहा हूं तो इसका यह कतई मतलब नहीं है कि मैं मान चुका हूं कि अन्य राज्य सरकारें बेहतर काम कर रही शिक्षा के मोर्चे पर. सभी में उन्नीस-बीस का ही फर्क है.

आप मानेंगे कि शिक्षा क्षेत्र में आकर कुछ बेहतर करने को लेकर हमारी नई पीढ़ी तो कभी उत्साहित नहीं होती. अब मेधावी नौजवान शिक्षक बनने के लिए तो तैयार ही नहीं हैं. यह सोचना होगा कि शिक्षक बनने को लेकर इस तरह का भाव नौजवानों में क्यों पैदा हो गया है? यह भी संभव है कि नौजवानों को लगता हो कि शिक्षक के रूप में अब करियर फायदे का सौदा नहीं रह गया. इसमें अस्थिरता ही अस्थिरता है.

अब दिल्ली यूनिवर्सिटी के 77 कॉलेजों की जरा बात कर लेते हैं. आपको यकीन नहीं होगा कि इनमें लगभग 4 हजार शिक्षक तदर्थ शिक्षक के रूप में ही पढ़ाते हैं. देश के इतने महत्वपूर्ण दिल्ली विश्वविद्यालय में भी पिछले कई सालों से शिक्षकों की स्थायी नियुक्ति नहीं हुई है. इसलिए विश्वविद्यालय प्रशासन ने बड़े पैमाने पर तदर्थ शिक्षकों की बहाली कर रखी है, ताकि कॉलेजों में शिक्षण का कार्य सुचारू रूप से चल सके. इस प्रक्रिया में भ्रष्टाचार की शिकायतें भी मिल रही हैं.

दरअसल यह दुर्भाग्यपूर्ण हालात तो सब जगहों पर ही देखी जा सकती है. ये तदर्थ अध्यापक हर दिन शोषण, मानसिक यंत्रणा, ज़्यादा काम और असुरक्षा के वातावरण में नौकरी करते हैं. वास्तव में कभी-कभी बेहद निराशा होती है कि हम शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषय को लेकर कितना गैर-जिम्मेदराना रवैया अपनाए हुए हैं. शिक्षा जैसे सवाल पर भी हमारे सभी राजनीतिक दल एक तरह से सोच नहीं पा रहे हैं. इस लिहाज से उत्तर भारत के राज्यों की स्थिति वास्तव में खासी दयनीय है.

अभी कुछ दिन पहले हरियाणा से एक खबर पढ़ने को मिली. खबर यह थी कि राज्य में 10वीं और 12वीं कक्षा की परीक्षाओं में जमकर नकल हुई. 10वीं की हिंदी की परीक्षा में नकल के 346 मामले दर्ज किए गए. जरा देख लीजिए कि हरियाणा जैसे विकसित राज्य में हम नकल पर काबू नहीं कर पा रहे हैं. बहरहाल, आपके पास जब किसी दल का नेता वोट मांगने आए तो जरा पूछ लें कि वो या उसकी पार्टी की शिक्षा के सवाल पर क्या नहीं है?

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