ईडी ने केस दर्ज करके शुरू की बंद पड़ी Laxmi Sugar Mill की जांच

बीएसपी सुप्रीमो मायावती के शासनकाल में कौड़ियों के भाव बिकी अरबों रुपये की सम्पति वाली बन्द लक्ष्मी शुगर मिल एक बार फिर चर्चा में आ गई है. सीबीआई के बाद अब प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने केस दर्ज करके जांच शुरू की है.

प्रशासनिक उदासीनता और कुप्रबंधन के चलते एशिया की नम्बर एक हरदोई की लक्ष्मी शुगर मिल 1999 में बन्द हुई. इससे पूर्व मिल की मशीनों की कर्कश आवाज़ हजारों कामगारों के लिए सुरीले राग की तरह होती थी और लाखों लोगों के ज़ायके में मिठास घोलती थी. लेकिन 1999 में मिल बंद होने से सभी मिलकर्मी दर-बदर हो गए.

इसके 8 साल बाद जुलाई 2007 में बीएसपी सुप्रीमो मायावती के शासनकाल में राज्य सरकार ने निजीकरण के प्रयासों के कारण मिल को औने-पौने दामों पर बेचकर हजारों मिल कर्मियों को बेरोजगार कर दिया.

सांसद अंशुल वर्मा का प्रयास सराहनीय

एशिया में चीनी उत्पादन में विशिष्ट पहचान रखने वाली लक्ष्मी शुगर मिल को संचालित करवाने के लिए सांसद अंशुल वर्मा ने भी प्रयास शुरू किए.

उन्होंने प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री से मिलकर मिल को फिर से शुरू करने का अनुरोध किया. 2017 में प्रदेश में बीजेपी की सरकार आने के एक साल बाद 16 जनवरी 2017 को सांसद अंशुल वर्मा ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखा.

अप्रैल 2018 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने चीनी मिल बेचे जाने के केस की सीबीआई जांच करने की सिफारिश की.

मिल की स्थापना कैसे हुई 

उद्योगपति बन्धु दया विनोद और सरन बाबू ने 1936 में लक्ष्मी शुगर मिल की स्थापना की थी. साल 1984 में यूपी की तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने मिल का अधिग्रहण कर गन्ना एवं चीनी विकास निगम को सौंप दिया था.

सरकारी हाथों में जाने के बाद मिल की साख को ग्रहण लग गया. किसानों के गन्ने का भुगतान लटकने लगा तो उनका गन्ने की बुवाई से मोहभंग हो गया. गन्ने का रकबा घटा तो मिल को क्षमता के मुताबिक गन्ना नहीं मिलने से उत्पादन गिरने लगा.

साल 1999 में हालात ये बने कि राज्य की तत्कालीन भाजपा सरकार ने घाटे का हवाला देते हुए गन्ना एवं चीनी विकास निगम की 36 में 15 मिलों को बन्द करने की अधिसूचना जारी कर दी, जिसमें से एक लक्ष्मी शुगर मिल भी थी.

मिल का बन्द होना स्थायी और अस्थायी करीब  2,000 कर्मचारियों के लिए बड़ा सदमा था. मिल में कार्यरत 1,200 स्थायी कामगारों को स्वैछिक सेवानिवृत्ति दे दी गई. कुछ कामगारों को प्रॉविडेण्ट फण्ड का 60 फ़ीसदी भुगतान और कुछ को आधी-अधूरी पेंशन मिली. बहुत ऐसे भी थे जिन्हें कुछ नसीब नहीं हुआ.

बड़ी संख्या में किसानों का भुगतान मारा गया. गैर ज़िलों के कामगार अपने गांवों की ओर लौट गए. जो स्थानीय थे, वह छोटा-मोटा धन्धा या मज़दूरी करके ज़िन्दगी की गाड़ी खींचने लगे.

समय के साथ मिल की मशीनें या तो डिस्पोज कर दी गईं या फिर आसपास के गांव वालों ने चुराकर कबाड़ में बेंच दीं.

मिल के तकनीकी विभाग के कर्मचारी रहे सरदार हरदयाल सिंह आज सर्कुलर रोड पर साइकिल रिपेयरिंग और स्पेयर पार्ट्स की दुकान चलाते हैं. वह मिल चालू करवाने के सिलसिले में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी और उसके बाद राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम से मिले, लेकिन आश्वासन से ज़्यादा कुछ भी लेकर नहीं लौटे.

मायावती के कार्यकाल में जगी थी उम्मीद

2007 में मायावती सरकार ने चीनी मिल का ताला खुलने की उम्मीद तब जगाई, जब सहकारी चीनी मिल संघ की बन्द 28 मिलों को निजी क्षेत्र में सौंपने का फैसला किया. मायावती सरकार का कार्यकाल पूरे होने यानी 2012 तक इसके बाद मिल को निजी हाथों में सौंपे जाने की बाबत कोई सुगबुगाहट नहीं मिली.

इसके बाद पता चला कि मिल को कौड़ियों के भाव बेच दिया गया है परंतु किसको? इस बारे में कुछ भी पता नहीं चला.

इसके बाद सीबीआई ने केस दर्ज कर जांच शुरू की. शुरुआती जांच में ही इस मामले में गड़बड़ियों की बात सामने आई थी.

आरोप है कि चीनी मिलों की गलत ढंग से की गई बिक्री की वजह से प्रदेश सरकार को 1,179 करोड़ रुपये के राजस्व का घाटा हुआ था. सीबीआई जांच में ही ये बात भी सामने आई कि ये मामला मनी लॉन्ड्रिंग का भी है.

इसके बाद अब इस मिल को कौड़ियों के भाव पर बेचने का मामला प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने भी दर्ज करके जांच शुरू कर दी है.

हिन्दुस्थान समाचार/अम्बरीष

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