हिंदी मत थोपें, सिर्फ अंग्रेजी हटाएं

dr vedpratap vaidik
Share on facebook
Facebook
Share on twitter
Twitter
Share on whatsapp
WhatsApp

डॉ. वेदप्रताप वैदिक

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री इ.के. पलानीस्वामी ने नई शिक्षा नीति के विरुद्ध झंडा गाड़ दिया है. उन्होंने कहा है कि तमिलनाडु के छात्रों पर हिंदी नहीं लादी जाएगी. वे सिर्फ तमिल और अंग्रेजी पढ़ेंगे. उनके इस कथन का समर्थन कांग्रेस समेत सभी तमिल दलों ने कर दिया है. तमिलनाडु की सिर्फ भाजपा पसोपेश में है. उसने मौन साधा हुआ है. भारत सरकार भी उसका विरोध क्यों करे? वह भी मौन साधे रहे तो अच्छा है.

1965-66 में केंद्र सरकार ने तमिल पार्टी द्रमुक के इसी रवैए का विरोध किया था तो तमिलनाडु में जबर्दस्त हिंदी-विरोधी आंदोलन चल पड़ा था. मुख्यमंत्री सी.एम. अन्नादुरई ने विधानसभा में केंद्र की त्रिभाषा नीति के विरोध में और द्विभाषा नीति के पक्ष में सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित करवाया था. अब पलानीस्वामी को कोई प्रस्ताव पारित करने की जरूरत नहीं पड़ेगी, क्योंकि नई शिक्षा नीति में राज्यों को पहले से ही छूट दे रखी है कि वे भाषा के मामले में जो उन्हें ठीक लगे, वह करें. यदि शिक्षा मंत्री डाॅ. निशंक इस मुद्दे पर कोई विवाद खड़ा करते हैं तो यह ठीक नहीं होगा.

अब वह करना जरूरी है, जो मैं 1965 से अबतक कहता चला आ रहा हूं. जब 1965-66 में पीएच.डी. करते समय मेरा विवाद संसद में उछला था, तब अन्नादुरई राज्यसभा के सदस्य थे. उनके सारे सदस्यों ने मेरे विरुद्ध संसद में इतनी बार हंगामा किया कि सत्र की कार्रवाइयां ठप्प हो जाती थीं लेकिन अन्नादुरईजी से मिलकर मैंने जब उनको समझाया कि मैं खुद हिंदी थोपने का विरोधी हूं तो द्रविड़ मुनेत्र कड़गम का विरोध ठंडा पड़ गया. मैंने उनसे कहा कि मैं बस अंग्रेजी थोपने का विरोधी हूं.

यदि भारत सरकार इस नई शिक्षा नीति के साथ-साथ यह घोषणा भी कर देती कि सरकारी भर्तियों और उच्चतम सरकारी कामकाज में भी अंग्रेजी नहीं थोपी जाएगी तो सारा मामला हल हो जाता. तमिलनाडु के जो भी लोग अखिल भारतीय स्तर पर आगे बढ़ना चाहते हैं, वे अपने आप सोचते कि उन्हें हिंदी सीखनी चाहिए या नहीं?

मैंने म.प्र. और उ.प्र. में कई तमिल अफसरों को इतनी धाराप्रवाह और शुद्ध हिंदी बोलते हुए सुना है कि हिंदीभाषी लोग भी उनका मुकाबला नहीं कर सकते. हिंदी बिना थोपे ही सबको आ जाएगी लेकिन सरकार को चाहिए कि वह सरकारी भर्ती और कामकाज से अंग्रेजी को तुरंत विदा करे. लेकिन मैं यह भी चाहता हूं कि अंग्रेजी ही नहीं, कई विदेशी भाषाएं हमारे छात्र स्वेच्छा से सीखें. यह विदेश व्यापार, विदेश नीति और उच्च-शोध के लिए जरूरी है.

(लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार और स्तंभकार हैं.)