दिल बेचारा रिव्यू : आखिरी फिल्म में भी जीना सीखा गया हीरो

 फिल्म    :  दिल बेचारा

स्टारकास्ट :  सुशांत सिंह राजपूत, संजना सांघी, सैफ अली खान

डायरेक्टर  : मुकेश छाबड़ा

 स्टार         : 31/2 

हमें जन्म कब लेना है और मरना कब ये हम डिसाइड नहीं करते, लेकिन जिंदगी को जीना कैसे है ये तो हम डिसाइड कर सकते हैं।कहने को तो बस ये एक डायलॉग है लेकिन अगर इसका मतलब हर कोई समझ जाए तो जिंदगी आसान हो जाए। सुशांत सिंह राजपूत की आखिरी फिल्म दिल बेचारा इसी खास मैसेज के साथ डिज्नी प्लस हॉटस्टार पर स्ट्रीम हुई।

कहानी

कहानी है जमेश्दपुर के दो ऐसे परिंदों की जिन्हें चाहत बस जीने की है- कैज़ी बासु ( संजना सांघी) और मैनियुल राजकुमार जूनियर उर्फ मैनी ( सुशांत सिंह राजपूत)।कैज़ी थाइरॉड कैंसर की मरीज है और उसका ऑक्सीजन सिलेंडर ही उसकी लाइफलाइन है, जिसका भार हर पल उसे ये याद दिलाता है कि वो नॉर्मल नहीं है।वहीं दूसरी तरफ मैनी है।मैनी भी एक जानलेवा बिमारी से पीड़ित है, जिसके चलते उसे अपना एक पैर भी खोना पड़ जाता है।वो चाहता तो दूसरों की तरह जिंदगी को जी भर कर कोस सकता है, पर मैनी जानता है कि अगर वो जिंदगी को कोसेगा तो जिएगा कब। 

कैज़ी, मैनी के अलावा फिल्म में जगदीश पांडे (शाहिल वैद) और अभिमन्यु राठौर ( सैफ अली खान ) भी हैं, जो इस कहानी को पूरा करते हैं।जगदीश पांडे मैनी का जिगरी दोस्त है, जिसे आंख का कैंसर है और आपको पता है कि आगे जाकर वो अंधा हो जाएगा।वहीं अभिमन्यु राठौर कैजी का फेवरिट सिंगर है जिसका अधूरा गाना कैज़ी की जिंदगी के खालीपन को भरता है। 

कहानी को प्रिडिक्ट करना आसान है क्योंकि ये हॉलीवुड फिल्म द फॉल्ट इन आर स्टार की हिंदी रीमेक है, लेकिन फिल्म के फ्रेश डायलॉग और एक्टर्स की शानदार परफोर्मंस इसे अलग बनाती है।कहने को तो ये एक लव स्टोरी है, पर ये उन टिपिकल बॉलीवुड लव स्टोरीज जैसी नहीं है, जिनमें आशिक एक दूसरे की याद में या तो खुद को तबाह कर लेता है या आबाद कर लेता है. ये तो बस एक सिंपल सी स्टोरी है जो एक ही जिंदगी को दो अलग नजरियों से दिखाती है। कैज़ी की शिकायतों को जब मैनी की जिंदादिली का साथ मिलता है तो वो जिंदगी को एक अलग नजरिए से देखने लगती है। 

डायरेक्शन और एक्टिंग

एक सुनी सुनाई कहानी को भी जिस तरह दोबारा थाली में परोसा गया है उसके लिए डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा की तारीफ होनी चाहिए।उन्होंने कहानी की आत्मा के साथ कोई छेड़छाड़ न करके भी इसे भारतीय दर्शकों से जोड़ दिया।सुशांत सिंह राजपूत की ये आखिरी फिल्म है इसलिए उनकी एक्टिंग को यहां मापना गलत होगा, लेकिन इतना जरुर है कि ये उनकी एक्टिंग का वो स्तर है, जहां एक फिक्शन कैरेक्टर भी जिंदा लगने लगता है।संजना ने भी अपने रोल में अच्छा काम किया है, वहीं सैफ का कैमियो भी अच्छा है।

रिव्यू

कहानी में जानने को ज्यादा कुछ नहीं है, लेकिन फिर भी फिल्म का हर डायलॉग दिल को छू जाता है।अगर यूं कहे कि ये फिल्म नहीं एक जज्बात है, जिसे समझ लिया तो जिंदगी से शिकायतें खत्म हो जाएंगी तो गलत नहीं होगा। 

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