दागदार दिग्विजय

बद्रीनाथ वर्मा

लगभग डेढ़ दशक बाद चुनावी राजनीति में लौटे मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह आज जरूर पछता रहे होंगे कि उन्होंने किस मनहूस घड़ी में भगवा आतंक का मुद्दा उछाला था. 

वह सफाई पर सफाई दिये जा रहे हैं लेकिन भगवा आतंक का यह भूत उनके पीछे हाथ धोकर पड़ गया है. मंदिरों में मत्था टेक रहे हैं, ललाट पर तिलक लगा रहे हैं, खुद को धार्मिक व्यक्ति बताने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं. 

बावजूद इसके भगवा आतंक या हिंदू आतंकवाद उनका लगातार पीछा कर रहा है. अकेला यही नहीं, बल्कि विवादों के दाग से पूरी तरह दागदार हैं दिग्विजय सिंह.

मालेगांव विस्फोट को आधार बनाकर भाजपा व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को घेरने के चक्कर में दिग्गी राजा ऐसे घिरे कि उससे निकल पाना अब उनके लिए भारी पड़ रहा है. 

इस्लामी आतंकवाद के बरक्स हिंदू आतंकवाद का प्रौपेगैंडा खड़ा करने का मूल उद्देश्य मुस्लिमों का पक्षधर बन वोट बैंक तैयार करना था. चाहे इसमें कुछ निरपराध हिंदुओं की बलि ही क्यों न चढ़ जाये. यह एक षड्यंत्र था. 

इस षड्यंत्र में दिग्विजय सिंह को तत्कालीन यूपीए सरकार गृहमंत्री सुशील शिंदे व पी चिदंबरम का भरपूर साथ मिला. इस तिकड़ी ने मिलकर हिंदू आतंकवाद का हौव्वा खड़ा कर सहिष्णु सनातन धर्म पर आतंक का दाग लगाने की असफल कोशिश की. 

हालांकि कोर्ट ने हिंदू आतंकवाद की हवा निकाल दी है. यानी मुंह ऊपर कर थूकने से वह खुद अपने ही ऊपर आकर गिरता है, वही इस मामले में भी हुआ.

हिंदू संगठनों के खिलाफ दिग्विजय सिंह के मन में कितना जहर भरा हुआ है, इसे 1998 में झाबुआ में ईसाई मठों में रह रही 4 ननों के साथ 24 लोगों द्वारा किये गये बलात्कार के आलोक में देखा जा सकता है. 

तत्कालीन मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने बिना किसी ठोस सबूत के ननों के बलात्कार के लिए हिंदूवादी संगठनों को दोषी ठहरा दिया था.

पूरा लेख पढ़ें युगवार्ता के 12 अप्रैल के अंक में…

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