परिचर्चा: अस्तित्व खो रहे हिंदी के उन्नयन से ही संभव है राष्ट्र का विकास

Hindi Diwas
Share on facebook
Facebook
Share on twitter
Twitter
Share on whatsapp
WhatsApp

बेगूसराय, बिहार।

14 सितम्बर 1949 को भारतीय संविधान में हिंदी को राष्ट्र भाषा के रूप में मान्यता दी गई, पर दुर्भाग्य है कि आजादी के इतने लंबा कालखंड बीतने के बाद भी वर्तमान युवा पीढ़ी हिंदी के बदले अंग्रेजी की तरफ भाग रही है. यह भारत के माथे पर एक कलंक है.

यह बात गढ़पुरा नमक सत्याग्रह गौरव यात्रा समिति की ओर से सोमवार को हिंदी दिवस के अवसर पर मारवाड़ी धर्मशाला गढ़पुरा में आयोजित परिचर्चा में वक्ताओं ने कही. कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए सामाजिक कार्यकर्ता सुशील कुमार सिंघानिया ने कहा कि भारत में शिक्षा की शुरुआत गुरुकुल की व्यवस्था से हुई थी.

उन्होंने कहा कि आज भी समाज की मुख्यधारा हिंदी पर आधारित है लेकिन शिक्षा का विस्तारीकरण, पाश्चात्य संस्कृति की ओर अंग्रेजी के प्रति बढ़ती जिज्ञासा लोगों को हिंदी से विरत कर अंग्रेजी के तरफ ले जा रही है. इससे संस्कार कमजोर पड़ रहे हैं, आचरण का ह्रास हो रहा है. इंग्लिश मीडियम की शिक्षा ने सामाजिक धारा को ही बदल दिया है.

मुकेश विक्रम ने कहा कि हम 21वीं सदी की ओर जा रहे हैं. ऐसे में हिंदी के अस्तित्व को बचाने की जरूरत है, लेकिन इसके लिए बना कानून, कानून की किताबों की शोभा बढ़ा रहा है. न्यायालयों में भी सभी महत्वपूर्ण कार्य अंग्रेजी में ही होते हैंं. हिंदी के उन्नयन से ही राष्ट्र का विकास संभव है.

उन्होंने कहा कि दक्षिण भारत के लोग महात्मा गांधी के प्रचार प्रसार के बावजूद हिंदी में काम करना नहीं चाहते हैं, सियासी विरोध हिंदी के साथ हो रहा है. इस अवसर पर कुमार संजीव ने राष्ट्रीय गीत के माध्यम से संस्कृति रही कराह ना मेरा रूप बिगाड़ो के माध्यम से हिंदी की दुर्दशा पर प्रहार किया.

इस मौके पर शिक्षाविद धर्म नारायण झा, राम मोहन सिंह एवं रामचरित्र सिंह ने भी हिंदी की दशा और दिशा पर अपने विचार रखे. इस मौके पर वक्ताओं ने रघुवंश प्रसाद सिंह को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए दो मिनट का मौन रखकर ईश्वर से उनकी आत्मा शांति की प्रार्थना की.

हिन्दुस्थान समाचार/सुरेन्द्र