दलित मुसलमानों का उत्थान हो – डॉ. एजाज अली

दलित मुस्लिम के लोगों को लेकर आप लगातार आंदोलनरत हैं. इस लम्बे आन्दोलन का रिजल्ट क्या रहा?
1994 से हम यह आंदोलन चला रहे हैं. हमने दलित मुसलमानों को मुख्यधारा में लाने के लिए लम्बी लड़ाई लड़ी है. उनमें शिक्षा की कमी है, उसे दूर किया जाए, उनकी गरीबी को दूर किया जाए, इसके लिए सरकारी इंतजाम होना चाहिए, सरकार को संवैधानिक रास्ता निकालना चाहिए.
हमारे यहां कुछ लोगों का ही दबदबा चलता है और वही समाज का ठेका लिए हुए हैं. फिर
भी न तो दलित मुस्लिम की शैक्षिक हालत सुधरी है और न ही उनकी सामाजिक हालात में सुधार आया है. हमारा आंदोलन चाहता है कि सच्चर कमिटी और रंगनाथ कमिटी की रिपोर्ट को अमल में लाया जाये ताकि दलित मुसलमानों का भला हो.

कहा जाता है कि दलित समाज के लिए विदेशों से भी पैसा आता है, फिर भी इनकी स्थिति क्यों नही सुधर रही है?
मेरा इस विषय पर गहन अध्ययन है। मेरा कहना है कि जिन लोगों ने इसका ठीका लिया हुआ था, उन्होंने इन लोगों के हालात को क्यूं नहीं सुधारा? इसका सीधा सा मतलब यह हुआ कि इन लोगों से यह मुमकिन नहीं है. इसलिए कहीं न कहीं हमें सरकारी रास्ता निकालना पड़ेगा, ताकि इनकी शैक्षिक और आर्थिक हालत सुधरे व देश की मुख्यधारा में आ सकें. जो समाज जाहिल-गरीब
होता है, उस पर धार्मिक इबादत का सबसे ज्यादा दबाव होता है. ऐसे लोगों को धर्म के नाम पर बहला कर इस्लाम खतरे में है जैसे नारे दिए जाते हैं, ताकि यह मुख्यधारा से कटे रहें और यह लोग जो समाज के तथाकथित ठेकेदार हैं, इनको इस्तेमाल करते रहें.

दलित मुस्लिमों को लेकर आपके संगठन की मांग क्या है?
मैं खुद पेशे से डॉक्टर हूं. हर तबके के लोग मेरे पास आते हैं. हमारा मिलना-जुलना इन लोगों से बहुत ज्यादा रहा है. इस लिहाज से मैं जानता हूं कि इस समाज के अंदर गरीबी और अशिक्षा दोनों ने ही घर बनाए हुए हैं. मेरा बस यही कहना है कि जो संवैंधानिक सुविधा हिन्दू दलित को मिलती है, वही सुविधा इनको भी मिले, तभी यह समाज अपना विकास कर पाएगा.

इनको भी शिक्षा और रोजगार में सुविधाएं दी जाएं, जिससे इनकी सामाजिक आर्थिक हालत में सुधार आये। फिलहाल दलित मुस्लिम, पिछड़ा वर्ग है और हम उसमें भी दलित मुस्लिमों की बात कर रहे हैं। हमारे यहां धोबी, मेहतर, भंगी, पासी हैं, जो जनजातियों के दायरे में आते हैं.

संविधान में दलित मुस्लिम समाज को क्या सुविधा मिली है?
1936 में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जन-जाति का आरक्षण शुरू हुआ था. उस समय इनकी हालत देखकर इनको उस रिजर्वेशन से बाहर नहीं रखा गया था. यही आरक्षण जब संविधान बना तो धारा 341 के अंतर्गत आया लेकिन 10 अगस्त 1950 को नेहरू की सरकार ने दलितों के लिए एक आर्डर जारी किया. उसमें यह कहा गया कि इस आरक्षण से अल्पसंख्यक समाज को बाहर रखा जायेगा, क्योंकि उस वक्त धार्मिक आधार पर आरक्षण पर प्रतिबंध लगाया गया था. उसका नतीजा यह हुआ कि जितने भी धार्मिक अल्पसंख्यक थे, वह इस रिजर्वेशन से बाहर हो गए.
इससे यह हुआ कि इनको जो भी सुविधाएं मिलती थीं, वह बंद कर दी गयीं। इनकी सामाजिक आर्थिक हालत बद्तर होती गई, जबकि 1956 में सिखों और 1990 में बौद्धों को इस आरक्षण में दोबारा शामिल किया गया. इसके विपरीत आज भी सिर्फ अल्पसंख्यक इससे वंचित हैं. बिहार से आंदोलन शुरू कर हम पूरे मुल्क में घूमे, बिहार सरकार से मांग की। वर्ष 2000 में बिहार सरकार ने विधान सभा में पास कर इस प्रस्ताव को केंद्र के पास भेजा. वहीं 2006 में उत्तर प्रदेश सरकार एवं 2008 में आंध्र प्रदेश की सरकार ने भी इसे पास कर केंद्र के पास भेज दिया,मगर केंद्र ने इस पर अभी तक कोई कम नहीं किया.

दलित मुस्लिमों की आबादी कितनी होगी?
देखिए कास्ट वाइज जनगणना तो हुई नहीं. पहली दफा हुई भी तो वह अभी सामने आई नहीं है. हर राज्य का शेड्यूल कास्ट लिस्ट बनी हुई है. दिल्ली की लिस्ट में 34 समुदायों का नाम दिया गया है. इसमें करीब 17 ऐसे नाम हैं जो मुसलमानों में पाए जाते हैं- जैसे धोबी, डोम, मोची, बाल्मीकि, सपेरे. मंडल कमीशन में जब यह बात उठाई गयी तो जो लोग 1950 में बाहर किए गए थे, उन्हीं को मंडल कमीशन में पिछड़ी सूची में डाल दिया गया.

भाजपा को लेकर मुस्लिमों में भय क्यों है?
मुझे ऐसा नहीं लगता कि भाजपा मुस्लिमों के खिलाफ है, मगर भय जरूर है और इसे फैलाया गया है. भय इनके दिमाग में डाल दिया गया है। यह लोग सैंकड़ो साल से बोल रहे हैं कि इस्लाम खतरे में है. भाजपा आएगी तो आप लोगों पर जुल्म होगा. इस बात को निचले तबके तक फैलाया गया है, लेकिन देखिये भाजपा की 5 साल सरकार रही, कहां कुछ ऐसा हुआ, हमें तो कुछ देखने को नहीं मिला. कांग्रेस के समय में तो 42,000 दंगे हुए लेकिन अभी कैसे सब ठीक चल रहा है. यह भ्रम है जो फैलाया गया है. यह सब अशिक्षा के कारण हुआ है.

यह समाज इस डर से कैसे उबर पायेगा?
जब तक यह मुस्लिम समाज टूटेगा नहीं,तब तक यह नहीं हो पायेगा. इन्हें तोड़ने का सबसे अच्छा तरीका संविधान में संशोधन कर इनको आरक्षण देना है ताकि यह शिक्षित हों और अपने हित-अहित को समझ सकें. पसमांदा मुस्लिमों की अशिक्षा का फायदा धार्मिक गुरुओं ने भी मदरसा खोलकर उठाया. वहां बच्चों को धार्मिक आधार पर कट्टर बनाया गया. वैसे यह हर जगह नहीं होता लेकिन इसका असर अभी के समय में व्यापक हो गया है.

पिछली मोदी सरकार में मुसलमानों को क्या फायदा हुआ है?
हमें व्यक्तिगत फायदा नहीं देखना चाहिए। हमें राष्ट्र और समाज के विषय में भी सोचना चाहिए. मोदी जी ने भ्रष्टाचार कम किया. शौचालय बनवाया, यह सबसे बड़ा उदाहरण है. गांव से हमारे यहां महिलाएं इलाज कराने आती हैं. हम उनसे पूछते हैं तो कहती हैं कि शौचालय से उनको फायदा हुआ है. सड़कें बनी हैं, सबको घर मिल रहा है. अभी सरकार ने स्वास्थ बीमा योजना शुरू की. अब लोगो का इलाज भी फ्री में होगा. यह सब जो फायदे हैं, वह सबके लिए हैं. जो पार्टियां सेकुलरिज्म के नाम पर डुग्गी बजाती हैं और दलित मुस्लिमों को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करती हैं, वह यह बात नहीं बताएंगी. इस मुद्दे पर मुख्तार अब्बास नकवी से मेरी बात हुई है. अभी मैं प्रधानमंत्री से नहीं मिल पाया हूं.

तीन तलाक पर आपका क्या कहना है?
तीन तलाक खत्म होना चाहिए, यह बिल्कुल गलत है. मैं इसके विरोध में बहुत पहले से हूं. इसमें सभी विपक्षी दलों को भी साथ देना चाहिए. मुस्लिम संगठनों को भी अपनी संकुचित सोच से निकलना चाहिए. बीजेपी का यह फैसला स्वागत योग्य है.

साभार यथावत

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