Monkey
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  • अब तक बंदरों को पकड़ने पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा चुके हैं, लेकिन समस्या जैसी की तैसी बनी हुई है
  • आपको बता दे कि पहले नगर निगम और वन विभाग में यह तय ही नहीं हो पा रहा था कि बंदरों से निपटने की जिम्मेदारी है किसकी

नई दिल्ली, 11 जुलाई. देश की राजधानी में बंदरों का आतंक मचा है. यह समस्या कितनी भयानक है, इसे समझने के लिए दिल्ली में मौजूद बंदरों की गणना की जाएगी. यह गणना देहरादून में मौजूद वाइल्डलाइफ इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया की मदद से होगी.

अब तक बंदरों को पकड़ने पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा चुके हैं, लेकिन समस्या जैसी की तैसी बनी हुई है.

आपको बता दे कि पहले नगर निगम और वन विभाग में यह तय ही नहीं हो पा रहा था कि बंदरों से निपटने की जिम्मेदारी है किसकी.

फिर 2007 में दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार से बंदरों को पकड़ने के लिये पिंजरा उपलब्ध कराने तथा नगर निगमों को इसे अलग-अलग स्थानों पर रखने का निर्देश दिया था.

उसके बाद अब पहली बार तीनों निगमों की बैठक हुई और गणना का फैसला लिया गया. अब तक इस बात की जानकारी नहीं है कि दिल्ली में आखिरकार कितने बंदर हैं.

पहले पकड़े जा चुके हैं करीब 23 हजार बंदर
निगम पहले भी रिहायशी इलाकों से बंदरों को पकड़कर असोला वाइल्ड लाइफ सैंचुरी भेज चुका है. इस पर करोड़ों रुपये खर्च हुए थे.

इसके बाद भी राजधानी में पिछले साल बंदरों के काटने के 950 मामले सामने आए. इसमें से 2 लोगों की तो मौत भी हो गई. इससे यह साबित होता है कि बंदरों के खतरे को रोकने के प्रयास नाकाफी रहे.

रिहायशी इलाकों में बंदरों के प्रवेश को रोकने के लिए अदालत ने अधिकारियों को वैसी जगहों के बाहरी क्षेत्र में 15 फीट ऊंची दीवार बनाने का भी निर्देश दिया था जहां बंदरों को भेजा गया है.

अधिकारियों ने बताया कि 20,000 से अधिक बंदरों को सैंचुरी भेजा गया लेकिन रिहायशी इलाकों में कितने बंदर इधर-उधर भटक रहे हैं, इसका कोई वास्तविक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है.

इसके अलावा सैंचुरी में भेजे गए बंदर भी वापस आ जाते हैं क्योंकि दीवारों में लोहे का ढांचा बना है जिससे ये बंदर आसानी से दीवार से निकल आते हैं.

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