election 2019
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भदोही. कांग्रेस जिलाध्यक्ष डा. नीलम मिश्र के त्यागपत्र के बाद जिले में पार्टी की कमान कौन संभालेगा? उन्होंने लोकसभा चुनाव के ठीक एक दिन पहले जिलाध्यक्ष पद से त्यागपत्र देकर कांग्रेस के लिए मुसीबत खड़ी कर दी है.कार्यवाहक के तौर पर राकेश मौर्य को जिलाध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गयी है लेकिन फिर ये बात उठ रही है कि अगला अध्यक्ष ब्राह्मण और वो भी काशी सदन से होगा या फिर पार्टी ओबीसी पर दांव खेलेगी.

भदोही जिले की राजनीति में कठौता स्थित काशी सदन की अपनी अहमियत रही है. डा. नीलम मिश्र तीन साल तक पार्टी की जिलाध्यक्ष रहीं. इसके पूर्व उनके पति रत्नेश मिश्र ने करीब दस साल तक ये जिम्मेदारी निभाई थी. पति की मौत के बाद नीलम मिश्र अध्यक्ष बनी थी. जिस तरह वाराणसी की कांग्रेसी राजनीति में औरंगाबाद हाउस यानी पंडित कमलापति त्रिपाठी के परिवार का दखल रहा है उसी तरह भदोही कांग्रेस की राजनीति में काशी सदन का प्रभाव रहा है.

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पूर्वांचल की राजनीति में अहम स्थान रखने वाले पंडित श्यामधर मिश्र पंडित नेहरु और इंदिरा गांधी के बेहद करीबी थे. यही वजह थी कि जब 1952 में स्वाधीनत भारत की पहली सरकार बनी तो पंडित नेहरु ने श्यामधर मिश्र को राज्य सभा में भेजकर देश का पहला केंद्रीय सिंचाई मंत्री बनाया था. वो 27 साल नेहरु मंत्रिमंडल में रहे थे. उसी परिवार की बहू नीलम मिश्र को प्रियंका गांधी से अपमानित होने के बाद त्यागपत्र देना पड़ा.

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उन्होंने मीडिया से बातचीत के दौरान में यह आरोप भी लगाया कि जिला कांग्रेस संगठन किसी स्थानीय उम्मीदवार को लोकसभा में उतारने की मांग करती रही, लेकिन यहां बाहरी उम्मीदवार उतारा गया. इसके बाद भी उम्मीदवार रमाकांत यादव की तरफ से संगठन को कभी तवज्जो नहीं दी गई. जब इस बारे में प्रियंका गांधी से शिकायत की गई तो उल्टे मुझे अपमानित होना पड़ा. इसी वजह से पार्टी छोड़नी पड़ी.

अब सवाल उठता है कि कांग्रेस जिलाध्यक्ष की कमान एक बार फिर काशी सदन के किसी उत्तराधिकारी को सौंपी जाएगी या नहीं. नीलम मिश्र को फिर पार्टी में लाया जाएगा या फिर किसी ओबीसी पर दांव खेला जाएगा क्योंकि अभी जिस राकेश मौर्य को कार्यवाहक अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गयी है उन्हें जिले में लोकप्रियता हासिल नहीं है.
हिन्दुस्थान समाचार/प्रभुनाथ