घर के न घाट के

बद्रीनाथ वर्मा

आधा छोड़ पूरा को धावे, आधा रहे न पूरा पावे यह लोकोक्ति उन दलों पर पूरी तरह से चरितार्थ हो रही है, जो हाल फिलहाल तक एनडीए का अंग थे. लेकिन अपनी महत्वाकांक्षा के चलते आज ये न तो घर के रहे और न ही घाट के. 

चाहे वह चंद्रबाबू नायडू हों या उपेंद्र कुशवाहा या ओम प्रकाश राजभर. इन तीनों को ही यह गुमान था कि 2014 का चुनाव भाजपा ने इन्हीं के बल पर जीता था. बीजेपी को धौंस देने के चक्कर में तीनों ही कहीं के नहीं रहे. 

इनमें से चंद्रबाबू नायडू 2018 में एनडीए से अलग हो गये थे लेकिन उपेंद्र कुशवाहा ने चुनाव के ठीक ऐन पहले और ओम प्रकाश राजभर ने चुनाव के बीचोबीच मोदी विरोध का झंडा उठा लिया. 

बिहार में नीतीश कुमार के एनडीए में शामिल होने के बाद बनी नई परिस्थितियों में सीटों के बंटवारे को लेकर उपेंद्र कुशवाहा अड़ गये. वह अपनी सीटों में किसी भी कीमत पर कटौती स्वीकार करने को राजी नहीं थे. 

बावजूद इसके कि खुद भाजपा ने गठबंधन के हित में 2014 में जीती अपनी पांच सीटें तक कुर्बान कर दी. बहरहाल, अपनी हठधर्मिता के शिकार कुशवाहा ने एनडीए का साथ छोड़कर महागठबंधन का हाथ पकड़ लिया.

इस उम्मीद में कि कुशवाहा मतों के साथ आरजेडी के मुस्लिम-यादव मतदाताओं का गठजोड़ उनकी सियासी स्थिति और मजबूत कर देगा. उनकी यह अवसरवादिता राज्य के मतदाताओं को बिल्कुल नहीं भायी. 

नतीजा, पिछली बार दो सीटें जीतने वाली राष्ट्रीय लोकतांत्रिक समता पार्टी का सूपड़ा साफ हो गया. रही सही कसर उनके दो विधायकों व एक एमएलसी ने पूरी कर दी. 

चुनाव में भारी पराजय के बाद उनकी पार्टी के दोनों विधायकों व एमएलसी जदयू में शामिल हो गये. उपेंद्र कुशवाहा की तरह ही उत्तर प्रदेश की योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर को भी गुमान हो गया था. 

राजभर वोटों की ठेकेदारी का वहम पाले ओम प्रकाश राजभर सरकार का अंग होने के बावजूद लगातार अपने बयानों से सरकार की फजीहत करते आ रहे थे. 

लोकसभा चुनाव में अपनी पार्टी के लिए सीटों की मांग पूरी न होने पर भाजपा को हराने में लग गये. बीजेपी ने उनके सामने अपने टिकट पर चुनाव लड़ने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन उन्हें वो मंजूर नहीं था.

पूरा लेख पढ़ें युगवार्ता के 09 जून के अंक में…

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