यूं ही नहीं झूका चीन

ब्रह्मानंद मिश्र

भारत बीते दो दशकों से तमाम अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद के खिलाफ पुरजोर अभियान छेड़े हुए है. साल 2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद भारत ने विभिन्न देशों के साथ द्विपक्षीय संबंधों को लेकर जो गर्मजोशी दिखायी है. 

भारत ने स्वयं को उभरती हुई ताकत के रूप में पेश किया है, उससे दुनिया का नजरिया भारत के प्रति बदला है. उसी का नतीजा है कि आज पूरी दुनिया भारत के साथ खड़ी है. 

हाल में न्यूजीलैंड और श्रीलंका में हुए आतंकी हमलों से दुनिया को यह एहसास हो गया है कि ऐसे मुद्दों पर छूट किसी भी देश के लिए आफत बन सकती है. 

उधर, अपने आर्थिक और सामरिक हितों को साधने के लिए पाकिस्तान की आतंकी गतिविधियों से मुंह फेरे चीन को भी सद्बुद्धि आ गई. उसे यह समझने को मजबूर होना पड़ा है कि अपनी सुरक्षा में जिस कुल्हाड़ी का वह बार-बार इस्तेमाल कर रहा है.

वह उसके पैर पर ही पड़ने वाली है. चीन शिनजियांग प्रांत में उइगर चरमपंथ को जिस तरह से कुचल रहा है, उससे पूरी दुनिया में उसकी फजीहत हो रही है. संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार संस्था ने भी चीन के तौर-तरीकों की आलोचना की है. 

दुनियाभर के आतंक के खिलाफ बन रहे माहौल में खुद को अलग-थलग पड़ता देख बीजिंग सुरक्षा परिषद के अन्य सदस्य देशों खासकर अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस के साथ खड़ा होना बेहतर समझा. 

जबकि पाकिस्तान यह माने बैठा था कि चीन हर बार दुनिया के सामने उसे बेइज्जत होने से बचा लेगा. उल्लेखनीय है कि चीन मसूद मामले में चार बार वीटो लगाकर मामले को टालने की कोशिश कर चुका था. 

चीन विश्व मंचों पर खुद को उभरती और जिम्मेदार महाशक्ति के रूप में पेश करता है, लेकिन एक घोषित आतंकी के पक्ष में खड़ा होने से उसकी छवि को किस तरह पलीता लग रहा है, उससे वह उबरना चाहता था. 

उसे समझ में आ गया था कि उरी आतंकी हमले के बाद सर्जिकल स्ट्राइक और पुलवामा आतंकी हमले के बाद बालाकोट आतंकी बेस पर एयर स्ट्राइक का वैश्विक समुदाय की ओर से किसी प्रकार का विरोध न किया जाना चीन के दुनिया के अन्य देशों से अलग-थलग पड़ते जाने का संकेत है.

पूरा लेख पढ़ें युगवार्ता के 12 मई के अंक में…

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