जातिवाद की ध्वस्त हुई राजनीति
  • बिहार में अगले वर्ष विधानसभा के चुनाव होने हैं. सबों की निगाह लोकसभा के चुनाव परिणाम की पृष्ठभूमि में विधानसभा को लेकर होंगी
  • बिहार में राजग को मिली ऐतिहासिक जीत के साथ उसकी जिम्मेवारी भी बढ़ गयी है

अरुण कुमार पाण्डेय

राज्य में लोकसभा की 40 सीटों के चुनाव परिणाम ने 1977 के लोकसभा चुनाव की याद दिला दी. आपातकाल की पृष्ठभूमि में हुए लोकसभा चुनाव में अविभाजित बिहार में कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया था. 

उसी तरह 2019 के चुनाव में महागठबंधन का सूफड़ा साफ हो गया. तब सभी 54 सीटों पर जनता पार्टी की जीत हुई थी. इस बार भी 40 में 39 सीटों पर राजग की अप्रत्याशित जीत हुई है. 

इससे विशेष रूप से जातिवादी राजनीति की बुनियाद पर बने छह दलों के महागठबंधन को जबर्दस्त झटका लगा है. मुस्लिम बहुल किशनगंज लोकसभा सीट पर कब्जा कायम रखते हुए कांग्रेस सफल रही है. 

बिहार में अगले वर्ष विधानसभा के चुनाव होने हैं. सबों की निगाह लोकसभा के चुनाव परिणाम की पृष्ठभूमि में विधानसभा को लेकर होंगी. 

हालांकि लोकसभा और विधानसभा चुनाव के मुद्दे, राजनीतिक परिस्थिति और सामाजिक समीकरण स्थानीय स्तर पर अलग—अलग होते हैं. 

परंतु इस चुनाव में राजग को मिली ऐतिहासिक जीत में मतों के अंतर से यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या महागठबंधन राजग के विजय रथ को विधानसभा के चुनाव में रोक पायेगा?

चुनाव के बीच लालू के दोनों बेटों तेजप्रताप और तेजस्वी के बीच अंदरूनी विवाद की सुर्खियां बनती रही हैं. मीसा भारती के पाटलिपुत्र लोकसभा क्षेत्र से लगातार दूसरी बार हार पर सबों की निगाहें टिकी हैं. 

राजग की जिम्मेदारी बढ़ी

बिहार में राजग को मिली ऐतिहासिक जीत के साथ उसकी जिम्मेवारी भी बढ़ गयी है. केन्द्र के साथ बिहार में भी राजग की सरकार होने से विकास का डबल ईंजन चलने पर जनता ने भरोसा किया है. 

जदयू की बिहार को विशेष राज्य का दर्जा की मांग के मद्देनजर केन्द्र से पिछड़े बिहार के विकास के लिए विशेष पहल की अपेक्षा लाजिमी है. 

विधानसभा के चुनाव में इसके हिसाब—किताब की अपेक्षा भी होगी.  इस बार के चुनाव में रघुवंश प्रसाद सिंह, जगदानंद सिंह सरीखे नेताओं को इसका खामियाजा भुगतना पड़ा है.

पूरा लेख पढ़ें युगवार्ता के 02 जून अंक में…

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