‘कोरोना से कन्फ्यूज होकर खुद पर ही हमला करने लगता है इम्यून सिस्टम’

आनंद गुप्ता

हकीकत यह है वायरस अपनी कोशिकाओं को बहुत तेजी के साथ प्रतिरूप और बहू गणित करते हैं. इन परिस्थितियों में अपनी कोशिकाओं नष्ट किए बिना इस वायरस को समाप्त करना बहुत कठिन है. जैसे कैंसर में कोवल्ट रे में देते है यह कोशिकाओं के साथ साधारण कोशिकाओं को नष्ट कर देते हैं. वायरस को शरीर की कोशिकाओं की आवश्यकता होती है यह शरीर की कोशिकाओं में घुसता है और संपूर्ण शारीरिक तंत्र पर अधिकार जमा कर शरीर को अपने वश में कर लेता है.

कुछ वायरस सुषुप्त अवस्था में रहते हैं. कुछ धीरे-धीरे प्रतिरूप में बहुगणित होते रहते हैं और कुछ कोशिकाओं से लंबे समय के दौरान रिसते हैं. कुछ वायरस शरीर में इतने प्रतिरूप बना लेते हैं कि शरीर की जिस कोशिका में इन्होंने प्रवेश किया होता है वे उसे नष्ट कर देते हैं. इसके बाद प्रति रूप में उत्पन्न वायरस कण फेल कर अन्य नहीं कोशिकाओं को संक्रमित करने के लगते हैं. इस सारी प्रक्रिया के दौरान एंटीवायरल उपचार जो इस वायरस जीवन चक्र को बाधित कर सके उसे सफल उपचार कहा जा सकता है.

कुल मिलाकर इस मामले में समस्या यह है कि यदि वायरस का उपचार वायरस के प्रतिरूप तैयार होने की प्रक्रिया को लक्ष्य बनाता है तो यह शरीर की स्वस्थ कोशिकाओं को भी नुकसान पहुंचाता है. यानी इलाज के दौरान वायरस संक्रमित कोशिकाओं को समाप्त करना आसान है लेकिन ऐसा करने पर शरीर के अंदर की अन्य स्वस्थ कोशिकाओं को भी जीवित रख पाना कठिन होता है.

जब कोरोना से कन्फ्यूज होकर खुद पर ही हमला करने लगता है इम्यून सिस्टम

हमारा इम्यून सिस्टम हमारी बाहरी बीमारियों, बैक्टीरियाज और वायरस से लड़ने में मदद करता है, लेकिन क्या हो अगर इम्यून सिस्टम कन्फ्यूज होकर खुद को नुकसान पहुंचाने लगे. पढ़ने में अजीब लगता है, लेकिन कोरोना वायरस के ऐसे भी मामले सामने आ रहे हैं. इस तरह के केस को साइटोकाइन स्टॉर्म सिंड्रोम (Cytokine storm syndrome) कहा जाता है.

जब शरीर के इम्यून सिस्टम को बीमारी, बैक्टीरिया या वायरस कन्फ्यूज कर देता है तो शरीर में जो साइटोकाइन प्रोटीन मौजूद होता है, उसमें गड़बड़ी आ जाती है. जिससे ये बीमारी, बैक्टीरिया या वायरस को नुकसान पहुंचाने के साथ-साथ शरीर की स्वस्थ कोशिकाओं पर भी हमला करने लग जाता है.

बाहरी बीमारियों से शरीर की करता है रक्षा

आमतौर पर साइटोकाइन शरीर में मौजूद एक इम्यून प्रोटीन होता है जो बाहरी बीमारियों से शरीर की रक्षा करता है. लेकिन कोरोना के मामले में इसमें गड़बड़ी भी देखी जा रही है. बर्मिंघम स्थित अलाबामा यूनिवर्सिटी के डॉ. रैंडी क्रॉन का कहना है कि साइटोकाइन एक तरह का प्रतिरोधक प्रोटीन होता है जो शरीर से संक्रमण और कैंसर जैसी बीमारियों को भगाने में मदद करता है, लेकिन इसके अनियंत्रित होने पर यह व्यक्ति को काफी गंभीर रुप से बीमार कर सकता है या जान भी ले सकता है.

मृतकों में पाई गईं साइटोकाइन स्टॉर्म सिंड्रोम की समस्या

अमेरिका के सेंटर्स फॉर डिजीस कंट्रोल (CDC) के अनुसार, अमेरिका में कोरोना के चलते मारे गए लोगों में से सबसे ज्यादा बुजुर्ग शामिल थें. इसमें से 85 साल के ऊपर वायरस से मारे गए लोगों में से 27 फीसदी लोगों की मौत की वजह साइटोकाइन स्टॉर्म सिंड्रोम ही था, लेकिन साइटोकाइन से पहले बुजुर्गों की अन्य बीमारियों को भी देखना जरुरी होगा.

फेफड़ों की कोशिकाओं पर हमला करते हैं वायरस

डॉ. क्रॉन ने बताया कि कोरोना वायरस हमारे शरीर की कोशिकाओं को अपने रहने, उन्हें बीमार करने और आखिरी में उन्हें खाकर नए वायरस पैदा करने के लिए इस्तेमाल करता है. कोरोना वायरस हमारे फेफड़ों की कोशिकाओं को इसलिए उपयोगी समझता है क्योंकि ये कोशिकाएं शरीर में मौजूद इम्यून सिस्टम को थोड़ी देर में रिस्पॉन्स करती हैं. जब कोरोना वायरस शरीर के इम्यून सिस्टम से छिपते हुए फेफड़ों की कोशिकाओं में जाता है तो वहीं से शरीर के अंदर शुरू होता है जीवन और मौत का असली युद्ध.

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