बना रहे बनारस

कृष्णनाथ

काशी दुनिया का प्राचीनतम जीवित नगर है. मनुष्य और उसके समाज-संस्कृतियों का एक अटूट सिलसिला यहां है. यह देश-विदेश की विभिन्न संस्कृतियों का नगर है. इसके बारे में काशी वासियों का और दुनिया का एक खास बोध रहा है.

काशी तीन लोक से न्यारी है. शिव की नगरी है, शिव के त्रिशूल पर बसी है. गंगा यहीं उत्तर वाहिनी बहती है. काशी महा श्मशान है. मणिकर्णिका पर चिता की अग्नि 5000 वर्ष से नित्य जलती है. काशी मुक्त क्षेत्र है.

यहां मृत्यु मिलने के बाद आदमी सीधे स्वर्ग जाता है. काशी अशरण शरण है, जिसकी कहीं गति नहीं, उसकी काशी में गति है. यहां तैंतीस कोटि देवता वास करते हैं. यहां का कंकड़-कंकड़ शंकर है.

ऐसे किस्म-किस्म के बोध की काशी की सामाजिक व्यवस्था क्या है? और इसका राजनीतिक व्यवहार पर क्या असर है? यह जानना आसान नहीं है.

मैंने आज कल की चाल के मुताबिक काशी का कोई समाज वैज्ञानिक शोध नहीं किया है, ऐसा कोई शोध मेरे देखने में आया है. मैं यहां जो कुछ लिख रहा हूं, वह बनारस में जन्मे, पले और भोगे हुए अनुभव के आधार पर लिख रहा हूं.

काशी और बनारस की सीमा बदलती रही है. काशी में काल निरवधि है. मैं इस लेख के प्रधान रूप में अपने अनुभव में आए काल का जिक्र करूंगा. यह प्रत्यक्ष परोक्ष अनुभव आजादी के थोड़ा पहले का और फिर आजादी के बाद की राजनीति का है.

भौगोलिक दृष्टि से काशी जनपद और बनारस शहर दोनों का जिक्र होगा. कभी-कभी एक के लिए दूसरे का भी. क्या काशी की कोई सामाजिक व्यवस्था है? या अनेक व्यवस्थाएं हैं?

इसी तरह क्या काशी का कोई एक राजनीतिक व्यवहार है? कई प्रकार की व्यवस्थाओं की परतें हैं. कई प्रकार के राजनीतिक व्यवहार हैं.

आखिर सामाजिक व्यवस्था और राजनीतिक व्यवहार का सामान्य अध्ययन काशी का ही क्यों? कहीं का भी हो सकता है. काशी के अध्ययन की विशेषता इसके बनारसी पन में है.

पूरा लेख पढ़ें मई के अंक में…

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