जन्मदिन विशेष: एक चाय वाले से पीएम बनने तक का सफर…

  • पीएम मोदी के जन्मदिन को सेवा सप्ताह के तौर पर मनाने के लिए अलग-अलग राज्यों में तैयारी चल रही है
  • मोदी देश ही नहीं बल्कि दुनिया भर के चर्चित नेताओं में से एक हैं. वे अपना जन्मदिन सादगी के साथ मनाते हैं और हर साल वो अपनी मां से आशीर्वाद लेने जरूर जाते हैं

नरेंद्र दामोदर दास मोदी का आज जन्मदिन है. ये वो नाम है जिसने दुनिया में हिंदुस्तान के नाम का परचम लहराया. पीएम के जन्मदिन को बीजेपी सेवा सप्ताह के तौर पर मना रही है.

पीएम मोदी के जन्मदिन को सेवा सप्ताह के तौर पर मनाने के लिए अलग-अलग राज्यों में तैयारी चल रही है. मंत्री, सांसद और नेता सभी अपने-अपने तरीके से सेवा सप्ताह मना रहे हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने जन्मदिन पर सरदार सरोवर बांध का दौरा करेंगे और वहां पूजा-अर्चना करेंगे.

तो आज इस एपिसोड में बात नरेंद्र मोदी की. वो कहानियां जो अनसुनी है, अनदेखी है. किसी ऐसी शख्सियत पर बात करना सबसे मुश्किल काम है जिसकी चर्चा हर जुबान पर हो और हर कोई उन्हें जानने समझने का दावा करता हो और जिनके बारे में गूगल पर सूचनाओं का भरमार हो और जिनपर 300 से ज्यादा किताबों की लंबी फेहरिस्त है.

फिर भी मेरी कोशिश उस कहानी को सुनाने की है बकौल आडवाणी मोस्ट क्रिस्टिसाइज्ड मैन ऑफ द कंट्री रहा हो लेकिन अब दुनिया भर में पसंदीदा लीडर बन गया हो.

हिन्दुस्तान की डिप्लोमेटिक पॉलिटिक्स हमेशा अमेरिका और रुस के बीच झूलती रही, लेकिन मोदी ने दोनों को साध लिया ट्रंप को भी और पुतिन को भी.

मोदी देश ही नहीं बल्कि दुनिया भर के चर्चित नेताओं में से एक हैं. वे अपना जन्मदिन सादगी के साथ मनाते हैं और हर साल वो अपनी मां से आशीर्वाद लेने जरूर जाते हैं.

मौजूदा वक्त में देश के सबसे लोकप्रिय नेता माने जाने वाले मोदी की कहानी को कहीं से भी शुरु करें, चाहे वो बचपन में स्कूल छोड़कर संघ की शाखा में जाने की बात हो या फिर वडनगर रेलवे स्टेशन पर चाय बेचने की या फिर 1995 में गुजरात बीजेपी से बाहर हो जाने की या फिर मई 2013 की वो ड्रामा और सस्पेंस से भरी गोवा में बीजेपी राष्ट्रीय की बैठक की, हर कहानी असंभव से संभावनाओं के दरवाजे खोलने की कहानी है

मैंने खुद वडनगर का वो रेलवे स्टेशन देखा ह. 11 अशोक रोड पर बीजेपी के पुराने दफ्तर के पीछे बने वो छोटा सा कमरा भी याद है जिसमें नरेंद्र मोदी रहा करते थे. एक तखत और बिखरे हुए अखबारों वाले कमरे में पार्टी के लोगों के साथ मुलाकातों का दौर का भी साक्षी रहा हूं.

हिमाचल प्रदेश के प्रभारी के तौर पर पहली जीत, 2001 में फिर से गुजरात में सीएम के तौर पर वापसी, मुख्यमंत्री बनने के बाद भी गांधीनगर से हर दिवाली यानी गुजराती नए साल पर सवेरे-सवेरे उनका फोन आना, फिर 2014 में राष्ट्रपति भवन के प्रागंण में वो शानदार शपथग्रहण समारोह, बीजेपी की पहली स्पष्ट बहुमत सरकार-ये सब देखने का मौका मुझे मिला.

नरेंद्र मोदी की तारफी करते हुए बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी कहते रहे-ही इज द मोस्ट क्रिटिसाइज्ड मैन इन इंडियन पॉलिटिक्स………सच भी था.

देश में कोई राजनेता और पॉलिटिकल पार्टी की बात छोड़िए खुद बीजेपी और मीडिया में कोई ऐसा नहीं होगा जिसने पर टिप्पणी नहीं की हो, लेकिन मोदी को मानो उन हमलों से ही ताकत मिलती गई और वे देश के सबसे लोकप्रिय, सबसे ताकतवर और सबसे पसंदीदा नेता बन गए.

मोदी के दिल्ली आने से पहले बीजेपी में अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, राजनाथ सिंह और सुषमा स्वराज जैसे नेता रहे. दिल्ली क्लब और कुछ नहीं.

नेताओं का एक तरीका है काम करने का. वे उस पावर एलीट ग्रूप में मान्यता चाहते हैं जो अंग्रेजी बोलने पढ़ने लिखने वाला है, सोसायटी का एलीट ग्रूप है. ऐसे ही मीडिया, पत्रकारों का एक ग्रूप है जिसे आप लुटियंस जर्नलिस्ट मान सकते हैं.

दिल्ली क्लब के इन नेताओं को इन जर्नलिस्ट की स्वीकर्यता चाहिए, मान्यता चाहिए. लेकिन मोदी ने उनके सामने अपनी स्वीकार्यता की जरुरत नहीं समझी और नही कोशिश की.

वाजपेयी और आडवाणी युग से बीजेपी और संघ से जुड़े राज्यसभा सांसद आरके सिन्हा मोदी को अभूतपूर्व युग कहते हैं. सिन्हा मानते हैं कि मोदी की लीडरशीप की खासियत यह है कि उनका समर्पण भारत की आम जनता के प्रति रहा है.

वे कहते हैं कि गांधी जी ने कहा था पंक्ति के आखिरी व्यक्ति के हिसाब से मॉडल को बनाया जाना चाहिए, सिर्फ मोदी ने सबके विकास के लिए राजनीति की.

मोदी की इमेज आज चौकीदार की ही है जो देश के खजाने की रखवाली कर रहे हैं. जीरो करप्शन और देश के विकास के तेज रफ्तार के लिए ऐसे ही चौकीदार की ही जरुरत है.

मोदी में मैनेजमेंट स्किल बहुत जबरदस्त है इसिलए वे रिसोर्सेज को बेहतर तरीके से मैनेज करते हैं जिससे ज्यादा फायदा मिल पाता है. मोदी को न हिन्दुस्तान की न केवल जमीनी हकीकत पता है बल्कि उसकी परेशानियों से निपटने का प्रशासनिक और राजनीतिक अनुभव भी है.

मोदी पॉलिटिक्स का मतलब सिर्फ पावर को समझते हैं और पावर के लिए चुनावों में जीत को जरुरी मानते हैं. यानी मोदी समझते हैं कि चुनावों में आपकी इमेज, आपका संदेश जनता के दिल तक उतरना चाहिए और अगर एक बार जनता को आपकी बात गले उतर गई फिर वो आपको नेता बना देती है, फिर चुनाव जीतना मुश्किल काम नहीं.

मोदी टेक्नोलॉजी का बेहतर इस्तेमाल करना जानते हैं. जैसे उन्होंने जनधन योजना शुरु करके किया, इसका फायदा यह है कि आज सरकार की करीब 500 योजनाएं ऐसी है जिनका फायदा सीधे आम आदमी को होता है. मोदी विकास के एजेंडा पर चलने वाले राजनेता हैं और इसलिए उन्हें सबका सपोर्ट मिला.

मोदी जब पहली बार मुख्यमंत्री बने तो मां के पैर छूने गए. मां ने कहा था बेटा सीएम बन रहे हो ध्यान रखना किसी के पैसे मत खाना. मां की इस सीख की मोदी ने ऐसी गांठ बांधी कि करप्शन के खिलाफ मोर्चा खोल लिया और 2014 के चुनाव में इस नारे के साथ उतरे कि ना खाऊंगा- न खाने दूंगा.

पीएम का मोदी का बचपन अभावों में गुजरा और उसी अभाव ने मोदी की ये प्रशासनिक सोच बनाई है कि वे गरीबों के लिए कई योजनाएं लेकर आए. उनके परिवार के 8 लोग एक मंजिल के तीन कमरों के मकान में रखते हैं. उस घर में शौचालय नहीं था.

तीन तरफ कपड़ा लगाकर बाथरुम की तरह इस्तेमाल किया जाता था. बचपन की इसी दिक्कत ने शायद पीएम मोदी को हर घर में शौचालय बनाने की अभियान शुरु करने की प्रेरणा दी.

उनकी मां चूल्हे पर खाना बनाती थी. बचपन में धुँए से मां की जलती आंखं वे नहीं भूल पाए इसलिए जन्म हुआ उज्जवला योजना का. आज 8करोड़ महिलाओं की रसोई में परेशानी और धुंआ नहीं गैस चूल्हा है.

मोदी बचपन में आम बच्चों से बिलकुल अलग थे. वे भाषण कला में शुरु से पारंगत थे. वे एक बार शर्मिष्ठा तालाब से एक घड़ियाल का बच्चा पकड़कर घर लेकर आ गए. मां के समझाने पर वे वापस उसे तालाब छोड़कर आए. नरेन्द्र मोदी बचपन में साधु-संतों से प्रभावित हुए. वे बचपन से ही संन्यासी बनना चाहते थे.

संन्यासी बनने के लिए मोदी स्कूल की पढ़ाई के बाद घर से भाग गए थे. इस दौरान मोदी पश्चिम बंगाल के रामकृष्ण आश्रम सहित कई जगहों पर घूमते रहे. वे बचपन से ही आरएसएस से जुड़े हुए थे.

1958 में दीपावली के दिन गुजरात आरएसएस के पहले प्रांत प्रचारक लक्ष्मण राव इनामदार उर्फ वकील साहब ने नरेंद्र मोदी को बाल स्वयंसेवक की शपथ दिलवाई थी.

उन्हें बचपन में एक्टिंग का शौक था और इसी शौक की बदौलत वे इमरजेंसी के दौरान जब वे अंडरग्राउंड होकर काम कर रहे थे तो अलग-अलग वेश बनाकर सफर करते थे. सरदार का रूप धरकर ढाई सालों तक पुलिस को छकाते रहे.

इमरजेंसी के खिलाफ सबसे ज्यादा साहित्य गुजरात में छपी और इस साहित्य को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने का काम वे करते थे, जो उस समय बेहद खतरनाक था.

उन्होंने गुजराती भाषा में हिंदुत्व से संबंधित कई लेख भी लिखे हैं. मोदी महान विचारक और युवा दार्शनिक संत स्वामी विवेकानंद से बहुत ज्यादा प्रभावित हैं. उन्होंने गुजरात में ‘विवेकानंद युवा विकास यात्रा’ निकाली थी.

वे बहुत मेहनती कार्यकर्ता थे. वे आरएसएस के बड़े शिविरों के आयोजन में मैनेजमेंट का हुनर दिखाते थे. आरएसएस नेताओं का ट्रेन और बस में रिजर्वेशन का जिम्मा उन्हीं के पास होता था.
वे हिमालय में कई महीनों तक साधुओं के साथ रहे. दो साल बाद जब वह हिमालय से वापस लौटे तब उन्होंने संन्यास जीवन त्यागने का फैसला लिया.

हिमालय से लौटने के बाद मोदी ने अपने भाई के साथ मिलकर अहमदाबाद की कई स्थानों पर चाय की दुकान भी लगाईं. उन्होंने हर कठिनाई को सहते हुए चाय बेची. नरेन्द्र मोदी बाद में घर छोड़कर संघ के प्रचारक बन गए.

जब नरेन्द्र मोदी प्रचारक थे तो उन्हें स्कूटर चलाना नहीं आता था. शकरसिंह वाघेला उन्हें अपनी स्कूटर पर घुमाया करते थे.

वे अपने कपड़े एक छोटे से झोले में रखते थे और अपने कपड़े खुद ही धोते थे. उन्होंने संघ में कुर्ते की बांह छोटी करवा लीं, ताकि वह ज्यादा खराब न हो और धोना नहीं पड़े. जो वर्तमान में मोदी ब्रांड का कुर्ता बन गया है और देशभर में मशहूर है.

नरेन्द्र मोदी अन्य प्रचारकों के विपरीत दाढ़ी रखते और उसे ट्रीम भी करवाते. वे समय के बड़े पाबंद हैं. वे सिर्फ साढ़े तीन घंटे की नींद लेते हैं, वे सुबह 5.30 बजे उठ जाते हैं.

वे स्वभाव से आशावादी व्यक्ति हैं. एक भाषण के दौरान उन्होंने कहा था कि लोगों को आधा गिलास पानी से भरा नजर आता है, लेकिन मुझे आधा गिलास पानी और आधा हवा से भरा नजर आता है.

आज जब देश में परिवारवादी राजनीति अपने चरम पर दिख रही है वहीं मोदी राजनीति में परिवारवाद के खिलाफ है. उनके परिवार का कोई दूसरा सदस्य राजनीति में नहीं है.

1995 में नरेंद्र मोदी के छोटे भाई प्रह्लाद मोदी बीजेपी के टिकट पर निगम पार्षद का चुनाव लड़ना चाहते थे लेकिन मोदी ने इसे खारिज कर दिया. इसी दौरान मोदी की बहन बासंती को भी जिला पंचायत अध्यक्ष का पर्चा भरने के लिए जोर दिया लेकिन मोदी ने उसके लिए भी मना कर दिया.

प्रधानमंत्री जिस ढंग का राजनीतिक जीवन खुद जीते आए हैं, उसमें परिवार और राजनीति के बीच बेहद आदर्श ढंग से अंतर रखा गया है. वे खुद परिवार और राजनीति के बीच हमेशा से बेहद दूरी बनाकर चलते रहे हैं .

मोदी पहले पीएम हैं देश के जिनके परिवार का कोई सदस्य प्रधानमंत्री के आधिकारिक आवास पर नहीं रहता है. प्रधानमंत्री के परिवार के सदस्य सामान्य मध्यमवर्गीय परिवारों की तरह अपना जीवन चला रहे हैं.

2001 से 2019 तक 18 साल राज्य और देश में सबसे ऊंचे पद पर बैठने के बावजूद न उन पर कोई भ्रष्टाचार का दाग लगा और न ही उनकी सरकार में बैठे किसी मंत्री को लेकर ऐसी बात हुई. भ्रष्टाचार हटाने और विकास के नारे के साथ प्रधानमंत्री मोदी ने स्मार्ट सिटी, मेक इन इंडिया और स्वच्छ भारत जैसे कई योजनाएं शुरु की.

पीएम के तौर पर मोदी के पहले कार्यकाल में नोटबंदी, जीएसटी, तीन तलाक कानून और देश में बढ़ते सांप्रदायिक नफरत को लेकर उनकी सरकार को आलोचना का सामना करना पड़ा लेकिन मोदी है तो मुमकिन के नारे के साथ वे 2019 के चुनाव में दोबारा जीतकर आए.

नरेन्द्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए कई देशों की यात्राएं की जिनमें चीन प्रमुख है. उन्होंने चीन के विकास को बहुत करीब से देखा. इसी तरह पीएम बनने के बाद उन्होने कई देशों की यात्राएं की है.

नरेन्द्र मोदी ने लोकसभा चुनाव 2014 में भी सोशल मीडिया का खूब प्रयोग किया. उन्होंने एक प्रचार समिति बनाई जिसका नाम सेंटर फॉर अकाउंटेबल गवर्नेंस है, जिसके हाथ में प्रचार की पूरी कमान थी.

देश में एक विधान और एक प्रधान का नारा बीजेपी हमेशा देती रही है. नरेंद्र मोदी ने इसलिए 70 साल पुराने धारा 370 को जम्मू-कश्मीर से हटाने का फैसला किया, लेकिन शायद ये बात कम लोगों को याद होगी कि कश्मीर उनके दिमाग में 90 के दशक से चल रहा था जब वे बीजेपी के तब के अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी की एकता यात्रा के राष्ट्रीय संयोजक थे.

कन्याकुमारी से जब यह यात्रा कश्मीर पहुंची तो 26 जनवरी 1952 को नरेंद्र मोदी ने श्रीनगर के लाल चौक पर जोशी के साथ तिरंगा फहराया. सुरक्षा एजेंसियों ने उन्हें आतंकी खतरे को देखते हुए बुलेट प्रूफ जैकेट पहनने की सलाह दी थी जिसे उन्होंने नहीं माना क्योंकि मोदी इरादों में फौलादी है. मोदी करिश्माई नेता तो हैं ही वे जनता के नब्ज और इमोशन को बेहतर समझते हैं.

2014 में चुनाव जीतने के बाद जब पहली बार संसद भवन पहुंचे तो गेट नंबर 1 की सीढि़यों पर चढ़ने से पहले उन्होंने सिर झुकाकर संसद को प्रणाम किया. ये तस्वीर शायद ही कभी भूली जा सकती है. 2019 में जब दोबारा जीत कर आए तो संसद के सेंट्रल हॉल में नेता चुने जाने से पहले तो उन्होंने वहां रखी संविधान की कॉपी को प्रणाम किया.

पिछले पांच सालों में अंतरराष्ट्रीय नेता बनकर उभरे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संयुक्त अरब अमीरात के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार ऑर्डर ऑफ जायद से सम्मानित किया गया. इससे पहले पीएम मोदी को संयुक्त राष्ट्र और दक्षिण कोरिया, सऊदी अरब, फलस्तीन, अफगानिस्तान, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) जैसे देशों द्वारा छह पुरस्कार दिए गए हैं.

इनमें से चार पुरस्कार मुस्लिम देशों से आए हैं. मोदी को सितंबर 2018 को संयुक्त राष्ट्र का सबसे बड़ा पर्यावरण सम्मान चैंपियंस ऑफ द अर्थ अवॉर्ड से सम्मानित किया गया.

संघ और बीजेपी के रिश्तों को लेकर हमेशा चर्चा होती रहती है लेकिन ये पहला मौका होगा जब दोनों संगठनों के बीच सबसे बेहतर तालमेल है.

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