कोरोनाकाल में बिहार के बदल गए हैं राजनीतिक समीकरण

बिहार में इसी साल चुनाव होने हैं. हालांकि कोरोना महामारी के चलते अभी तक ये तय नहीं हुआ है कि चुनाव कब तक कराए जाएंगे. लेकिन बीजेपी ने चुनावी तैयारी शुरू कर दी है. कोरोना के बाद बिहार में राजनीतिक समीकरण एकदम से बदल गए हैं.

लॉकडाउन की वजह से प्रवासी मजदूर की घर वापसी हो चुकी है. तो वे भी इस बार के चुनाव में हिस्सा में ले सकते हैं. इस तरह से जातिगत वोटबैंक की राजनीति करने वाले महारथियों को एक बार फिर से माथापच्ची करनी पड़ेगी. अभी तक युवा वर्ग ज्यादातर रोजगार को लेकर प्रदेश से बाहर रहता था. लेकिन इस बार वो भी चुनाव में हिस्सा लेगा.

नीतीश के सामने समस्याएं

प्रवासी मजदूरों को घर वापसी में जितनी दिक्कतों का सामना करना पड़ा है. मुख्यमंत्री नीतीश का रवैया प्रवासी मजदूरों के प्रति काफी निराशा जनक रहा है. इसको लेकर बीजेपी के कई नेता भी नाराज हैं. प्रवासी मजदूरों के लिए झारखंड के नए नवेले मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने जिस तरह से काम किया, नीतीश की उनसे तुलना की जाएगी.

नीतीश ने जब प्रवासी मजदूरों के वापसी के लिए कोई खास दिलचस्पी नहीं ली थी, तब हेमंत ने रेलमंत्री को चिट्ठी लिखकर ट्रेन चलाने की अपील की थी. जब बिहार के मजदूर ट्रेन से आ रहे थे. तब झारखंड के मजदूरों को हवाई जहाज से लाया गया. हो सकता है प्रवासी मजदूर इसका बदला चुनाव में सरकार के खिलाफ वोटिंग करके ले सकते हैं.

तब्लीगियों से हुआ ध्रुवीकरण

तब्लीगियों के कारण कोरोना संक्रमण इतना ज्यादा फैल गया. इसको लेकर गांव-गांव तक ध्रुवीकरण हो गया है. लोग मुसलमानों से इतना नाराज हो गए हैं कि समाजिक बहिष्कार तक की घटनाएं देखने को मिली हैं. बीजेपी के साथ होन के कारण नीतीश को लोगों के इस गुस्से का फायदा मिल सकता है.

प्रवासियों की दूर हो गई नाराजगी

प्रवासी श्रमिक जब सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर अपने गांव पहुंचे थे, तब भले ही वे सरकार से नाराज हो, लेकिन उसके बाद जिस प्रकार से उन्हें वारंटी कैंप में रखा गया और उनके भोजन से लेकर स्वास्थ्य का पूरा इंतजाम किया गया. उससे नाराजगी दूर हो गई है.

सीएम नीतीश ने उनके टिकट से लेकर खाते में पैसा दिए जाने तक से श्रमिकों की नाराजगी दूर हुई है. इसके अलावा, गरीबों के खाते में वो चाहे राशन के लिए 1 हजार रूपए डाले या अन्य योजनाओं का पैसा एडवांस में भुगतान करने के कारण नीतीश कुमार के खिलाफ बहुत ज़्यादा आक्रोश नहीं बचा है.

युवा फिर से पहना सकते हैं ताज

बड़ी संख्या में लौटकर आए युवा भी इस चुनाव में हिस्सा लेंगे. पीएम मोदी को युवा काफी पसंद करते हैं. मोदी के मैदान में आते ही युवा एनडीए की ओर झुक सकते हैं. नीतीश की 15 साल की सरकार में एक भी घोटाला सामने नहीं आया, ये भी नीतीश के लिए अच्छी बात हो सकती है. वहीं लालू परिवार में जिस तरह से विवाद हुए हैं, इसका भी असर चुनाव में देखने को मिलेगा.

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