SAHEED DIWAS 2019: भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को इस दिन दी गई थी फांसी

नई दिल्ली. 88 साल पहले 23 मार्च को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दी गई थी. इस दिन को शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है. शहीद दिवस पर भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को देशभर में याद किया जा रहा है.

भगत सिंह और उनके साथी राजगुरु और सुखदेव को फांसी दिया जाना भारत के इतिहास में दर्ज सबसे बड़ी एवं महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है.

भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने 1928 में लाहौर में एक ब्रिटिश जूनियर पुलिस अधिकारी जॉन सॉन्डर्स की गोली मारकर हत्या कर दी थी (लाहौर षड्यंत्र केस). इसके लिए तीनों को फांसी की सजा सुनाई थी.

पाकिस्तान में भी भगत सिंह का है आदर- भगत सिंह सिर्फ भारत के ही नायक नहीं हैं, बल्कि पाकिस्तान में भी समान रूप से आदर और सम्मान पाते हैं. वे दोनों देशों के साझा नायक हैं.

पीएम ने किया वीरों का याद – पीएम मोदी ने भी भारत के इन वीरों को याद किया. उन्होंने लिखा, ‘आजादी के अमर सेनानी वीर भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को शहीद दिवस पर शत-शत नमन. भारत माता के इन पराक्रमी सपूतों के त्याग, संघर्ष और आदर्श की कहानी इस देश को हमेशा प्रेरित करती रहेगी. जय हिंद!’

देश के लिए प्राण न्योछावर करनेवाले तीनों को याद करते हुए मोदी ने कहा कि देश के युवाओं को न्यू इंडिया बनाने में सहयोग देना चाहिए जिससे उनका सपना पूरा हो सके. पीएम मोदी के अलावा शिवराज सिंह चौहान, चंद्रबाबू नायडू, वसुंधरा राजे, अमित शाह आदि ने भी ट्वीट किए. बता दें कि 23 मार्च को ही इन तीनों को फांसी दी गई थी.

23 मार्च को दी गई थी फांसी- साल 1931 में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान क्रांतिकारी भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को 23 मार्च को ही फांसी दी गई थी. 23 मार्च को शहीद दिवस के रूप में भी जाना जाता है.

आजादी के आंदोलन के सिपाही- भगत सिंह आजादी के आंदोलन के ऐसे सिपाही रहे हैं, जिनका जिक्र आते ही शरीर में जोश दौड़ जाता है और रोंगटे खड़े हो जाते हैं. खुद को देशभक्ति के जज्बे से भरने के लिए उनका नाम लेना ही काफी है.

असेंबली में फेंका था बम- भगत सिंह ने अंग्रेजों से लोहा लिया और असेंबली में बम फेंककर उन्हें सोती नींद से जगाने का काम किया था, असेंबली में बम फेंकने के बाद वे भागे नहीं और जिसके नतीजतन उन्हें फांसी की सजा हो गई.

जलियावाला बाग कांड से भगत सिंह के अंदर जागा क्रांतिकारी- जालियावाला बाग कांड ने 12 साल के भगत सिंह को अंदर से हिला दिया जिसके बाद वो हमेशा के लिए क्रांतिकारी बन गए. शादी से दूर भागने वाले भगत सिंह आजादी को अपनी दुल्हन बनाना चाहते थे इसलिए घर परिवार छोड़कर वो कानपुर आ गए.

फांसी के फंदे पर चढ़ने का फरमान पहुंचने के बाद जब जल्लाद उनके पास आया तब बिना सिर उठाए भगतसिंह ने कहा ‘ठहरो भाई, मैं लेनिन की जीवनी पढ़ रहा हूं. एक क्रांतिकारी दूसरे क्रां​तिकारी से मिल रहा है‘

अंग्रेजों के लिए थे भगत सिंह थे दहशत का नाम- भगत सिंह जो सिर्फ अपने दिल की सुनते और मानते थे. भगत सिंह ने अंग्रेजों से लोहा लिया और असेंबली में बम फेंककर उन्हें सोती नींद से जगाने का काम किया था. असेंबली में बम फेंकने के बाद भगत सिंह वहां से भागे नहीं, बल्कि खुद को गिरफ्तार कराया. जिसके बाद उन्हें फांसी की सजा दी गई.

भगत सिंह के ये आखिरी बोल सोए देशवासियों को जगाने का काम किया और अंग्रेजों के खिलाफ आवाज बुलंद होने लगे. आजादी के इस महानायक ने बताया कि जिंदगी भले ही छोटी हो लेकिन उसमें बड़े काम किए जा सकते हैं जो आपकों हमेशा के लिए अमर बना देता है.

%d bloggers like this: