बेगूसराय विधानसभा: अब यहां कांग्रेस का कम्युनिस्ट नहीं, BJP से होता है मुकाबला

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बेगूसराय, 26 सितम्बर (हि.स.). बिहार विधानसभा चुनाव की आदर्श आचार संहिता लागू हो चुकी है. बेगूसराय के सभी सात विधानसभा क्षेत्र में 3 नवम्बर को मतदान होना है. इसके लिए 9 अक्टूबर से प्रक्रिया शुरू हो जाएगी. नामांकन दाखिल करने में महज 12 दिन शेष हैं.

बेगूसराय विधानसभा क्षेत्र में खास मुकाबला एनडीए और महागठबंधन में होना है. महागठबंधन के हिस्से से यह सीट कांग्रेस की सीटिंग है और पूरी संभावना है कि 30 साल के बाद कांग्रेस का झंडा बुलंद करने वाली निवर्तमान विधायक और बिहार प्रदेश महिला कांग्रेस अध्यक्ष अमिता भूषण पर पार्टी फिर विश्वास जताएगी.

एनडीए की रणनीति के अनुसार यह सीट भाजपा के हिस्से में जानी है तथा भाजपा में छह से अधिक लोग टिकट के लिए पटना से दिल्ली तक की दौड़ लगा रहे हैं. वरिष्ठ भाजपा नेता और सांसद प्रतिनिधि अमरेंद्र कुमार अमर, प्रदेश कार्यसमिति सदस्य कुंदन सिंह और पूर्व विधायक सुरेंद्र मेहता में से किन्हीं को टिकट दिए जाने की संभावना है.

बेगूसराय मुख्यालय की यह विधानसभा सीट जिले की हॉट सीट मानी जाती है. अगड़ा बहुल्य इस क्षेत्र में दूसरे नंबर पर अति पिछड़ा वोटर की संख्या, तीसरेेे नंबर पर एससी वोटर की संख्या तथा सबसे कम लवकुश वोटर हैं.

बेगूसराय सदर प्रखंड की 16 पंचायतों के अलावा नगर निगम क्षेत्र (दक्षिण भाग को छोड़कर), वीरपुर प्रखंड के सभी आठ पंचायत तथा बरौनी प्रखंड के पांच पंचायत वभनगामा, मैदा वभनगामा, सहुरी, नींगा और बथौली पंचायत इसमें शामिल हैं.

तीन लाख 32 हजार 756 मतदाताओं के लिए 507 मतदान केंद्र बनाए गए हैं. इनमें 99 नक्सल प्रभावित, 121 संवेदनशील, 22 अति संवेदनशील तथा 265 सामान्य मतदान केंद्र हैं.

शुरु से ही राजनीति का केन्द्र मानी जानी वाली इस सीट पर कभी कांग्रेस बनाम कम्युनिस्ट के बीच संघर्ष चलता था. इलाके की सामाजिक, राजनीतिक और भौगोलिक हालत बदली तो 2000 के बाद यह भाजपा बनाम कांग्रेस का चुनावी रणक्षेत्र बन गया. लेकिन 2015 के चुनाव में कांग्रेस ने 30 वर्षों के बाद इस सीट पर अपनी वापसी कर ली.

1952 में हुए पहले चुनाव में कांग्रेस के मो. इलियास विधायक चुने गए थे. 1956 में मो. इलियास की मौत होने के बाद उसी वर्ष हुए उप चुनाव में सीपीआई के चंद्रशेखर सिंह चुने गए. 1957 में कांग्रेस के सरयू प्रसाद सिंह, 1962 में कांग्रेस के रामनारायण चौधरी विधायक बने. 1967 में बड़ा परिवर्तन हुआ तथा निर्दलीय भोला सिंह ने वामदलों की मदद से सीट जीत ली.

1969 में सरयू प्रसाद सिंह ने सीपीआई के भोला सिंह को पराजित किया लेकिन 1972 में सीपीआई के भोला सिंह ने कांग्रेस को पराजित कर दिया. 1976 में भोला सिंह सीपीआई छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गए और 1977, 1980 एवं 1985 के चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर जीत कर हैट्रिक लगा दी. 1990 में सीपीएम से शिक्षक नेता वासुदेव सिंह, 1995 में सीपीएम के राजेन्द्र सिंह ने वामदल का कब्जा बरकरार रखा.

वर्ष 2000 में राजनीति का समीकरण बदला तो भोला सिंह राजद छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए और पहली बार यहां कमल खिलाया. 2005 के दोनों चुनाव में भोला सिंह ने भाजपा को यहां से जीत दिलाई.

2009 में भोला सिंह नवादा से सांसद बन गए तो उप चुनाव में भाजपा के श्रीकृष्ण सिंह तथा 2010 में सुरेन्द्र मेहता ने कमल खिलाया. लेकिन 2015 में अमिता भूषण ने सुरेन्द्र मेहता को पराजित कर 30 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद कांग्रेस का कब्जा करा दिया.

इस बार दोनों गठबंधन के स्वरूप बदले हुए हैं. महागठबंधन से कांग्रेस की सीटिंग सीट होने के कारण अमिता भूषण को टिकट मिलना तय माना जा रहा है. एनडीए में यह भाजपा की रनर सीट है तथा उसी के पाले में जाना तय माना जा रहा है.

फिलहाल सबकुछ दोनों गठबंधन के नेतृत्व पर निर्भर करता हैै कि किसे रण क्षेत्र में उतारा जाता है. अगलेेे सप्ताह तक यह स्पष्ट हो जाएगा, उसकेे बाद देखना होगा कि जनता किस पर विश्वास जताती है.

हिन्दुस्थान समाचार/सुरेन्द्र/बच्चन