बड़ौदा हाऊस में बड़ा खेल

जितेन्द्र चतुर्वेदी

भ्रष्ट अधिकारियों को बचाने का खेल रेलवे बोर्ड में चल रहा है. बड़े-बड़े अधिकारी ऐसे लोगों के पैरोकार बन गए हैं. वे उन्हें संरक्षण दे रहे हैं. 

अगर कोई इसके खिलाफ आवाज उठाता है तो उसे, डराया-धमकाया जाता है. पदोन्नति रोकने का भय दिखाया जाता है. इस तरह का माहौल बड़ौदा हाउस में है. 

यहीं उत्तर रेलवे बोर्ड का मुख्यालय है. यहां काम के बजाए हेराफेरी करने वालों को बचाने की जुगत भिड़ाई जाती है. पूरा बोर्ड इसी काम में लगा है. तभी तो जो काम महीने भर में खत्म होना चाहिए, उसे पूरा करने में साढ़े चार महीने लग जाते हैं. 

वह इसलिए नहीं कि बोर्ड के अधिकारियों के सिर पर काम का बहुत बोझ है बल्कि इसलिए क्योंकि वे लोग कुछ आरोपियों के पक्ष में खड़े हैं. उन्हें विजिलेंस से बचाना है. 

उसके लिए तानाबाना बुनना पड़ता है. कहां-कहां जुगाड़ लगाया जा सकता है, उसका गणित बैठाना पड़ता है. इन सब में समय लगता है. तो जाहिर है बाकी काम देर से होगा. 

ऐसा ही विभागीय परीक्षा के साथ हुआ. इसमें सी समूह के कर्मचारियों को बी समूह में प्रोन्नत करना था. उसके लिए परीक्षा होती है. इसे महीने भर के अंदर करना होता है. 

लेकिन बोर्ड की लापरवाही देखिए, उसे परीक्षा लेने और उसका परिणाम घोषित करने में साढ़े चार महीने लग गए. जो सीधे तौर पर रेलवे बोर्ड के नियमों का उल्लंघन है, लेकिन इसकी कहां किसी को चिंता है. 

नियम तोड़ना तो बोर्ड का स्वभाव बन चुका है. इस तरह का स्वभाव क्यों बना और परीक्षा में देरी क्यों हुई? इसका किस्सा बहुत दिलचस्प है. हुआ यह कि बोर्ड में भाई-भतीजावाद की संस्कृति ने जन्म ले लिया. 

इस वजह से सबको खुश रखने का सिलसिला चल पड़ा. अधिकारी किसी को नाराज करने का जोखिम नहीं उठा सकते थे. इस वजह से राजदारों को बचाने का सिलसिला भी चल पड़ा. 

उनमें से कुछ का नाम बाहर आ गए हैं. एक हैं आशीष गुलाटी और दूसरे हैं, संजीव कुलश्रेष्ठ. इनकी हेराफेरी के किस्से बोर्ड में प्रचलित हैं. लोग इनकी मिसाल देते हैं. कहते हैं, कैसी सेटिंग है दोनों की. 

पूरा लेख पढ़ें यथावत के 01-15 जुलाई के अंक में…

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